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बचपन को ढूँढने बैठा हूँ :- बचपन की यादें छोटी कविता भाग – 2

by Sandeep Kumar Singh

बचपन जीवन का एक ऐसा हिस्सा होता है जिसे हम जब भी याद करते हैं तो हमारे चेहरे पर बस एक हलकी सी मुस्कान आ जाती है। ये बचपन की यादें अक्सर हमारी सोच में तभी आती हैं जब हम कुछ फुर्सत के लम्हों में होते हैं। ऐसे ही एक लम्हे में मैंने ये कविता ‘ बचपन को ढूँढने बैठा हूँ ‘ लिखने की कोशिश की है। उम्मीद करता हूँ ये कविता आपको आपकी बचपन की यादों के साथ जोड़ने में कामयाब होगी।

बचपन को ढूँढने बैठा हूँ

बचपन को ढूँढने बैठा हूँ

शाम ढले आसमान के तले मैं आँखें मूँद के बैठा हूँ,
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

हैं गम भी बहुत परेशानियाँ भी हैं
वक़्त की दी हुयी निशानियाँ भी हैं,
और साथ में हैं दर्द कई उन सब को भूलने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

कभी खुले असमान के नीचे गलियों में दौड़ जब लगती थी
माँ-पापा प्यार बहुत करते डांट कभी-कभी पड़ती थी,
उन्हीं बीते पलों को आज मैं फिर से टटोलने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

वो लाइट का आना-जाना मिलकर सबका शोर मचाना
रात को पढ़ना लालटेन में भोर भये से फिरे उठ जाना,
गाँव के विद्यालय जाती उस पगडण्डी पर घूमने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

फिर टन-टन घंटी बजती थी दौड़ के घर सब जाते थे
खेलते थे बच्चे जब शाम को बड़े बुजुर्ग चौपाल सजाते थे,
मंदिर में होती आरती और रामायण सुनने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

आज कहाँ वो गलियां हैं कहाँ रहे वो चौबारे
कहाँ गये वो साथी जो हर शाम हमको जो पुकारे,
याद जो आये उन किस्सों को आज मैं बुनने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

शाम ढले आसमान के तले मैं आँखें मूँद के बैठा हूँ,
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

पढ़िए कविता :- बचपन की यादें – नानी का घर

इस कविता के बारे में अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

पढ़िए बचपन से संबंधित एनी रचनाएँ :-

धन्यवाद।

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9 comments

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Devendra Kumar November 14, 2019 - 9:03 AM

आपने बहुत अच्छी कविताऐं लिखी हैं
पढ़ते पढ़ते अपना बचपन याद आ गया।

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Rishpal bajekan December 19, 2018 - 7:59 PM

पुरानी यादें ताजा कर दी आपने

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Rishpal bajekan December 19, 2018 - 7:58 PM

आपकी कविता को कॉपी पेस्ट कर सकता हूं

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Sandeep Kumar Singh
Sandeep Kumar Singh December 25, 2018 - 2:21 PM

Rishpal Bajekan जी आप कविता को लिंक के साथ शेयर कर सकते हैं।

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Kunal singh November 13, 2018 - 12:39 PM

Sir apka poetry padh k mujhe Rona aagya.
Bs yehi question krta hu khud se ki mai itna bda q ho gya ????????????

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Yogesh Chandra Goyal April 24, 2018 - 9:38 AM

बचपन को ढूँढने बैठा हूँ –
Enjoyed reading this lovely poem
thanks a lot Sandeep bhai

Reply
Sandeep Kumar Singh
Sandeep Kumar Singh April 24, 2018 - 10:44 PM

Thank you also for reading this Yogesh Chandra Goyal ji…

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Naveen January 13, 2018 - 1:44 AM

गुरुजी आपकी कविता पढ़कर बहुत आनंद मिला, हर रोज़ मैं यही से अपने status copy करके update करता हूँ ????☺️☺️☺️

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Sandeep Kumar Singh
Sandeep Kumar Singh January 13, 2018 - 11:33 AM

नवीन जी अच्छा लगा ये जानकर की आपको हमारी रचनाएं पसंद आती हैं। धन्यवाद। लेकिन स्टेटस के साथ हमारे ब्लॉग को भी अवश्य शेयर करें। धन्यवाद।

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