वो बचपन मैं कहाँ से लाऊँ? | बचपन की याद में भावनात्मक कविता

कभी मन में विचार आया है फिर से बचपन में लौट जाने का? अत तो जरूर होगा। लेकिन उस बालपन में जाकर आप करेंगे क्या? शायद वही जो इस कविता में लिखा गया है। क्या लिखा है कविता में आइये पढ़ते हैं कविता वो बचपन मैं कहाँ से लाऊँ? में :-

वो बचपन मैं कहाँ से लाऊँ?

वो बचपन मैं कहाँ से लाऊँ?

हरे -भरे पेड़ों की जो थी, होती ठंडी-ठंडी छाँव
उनके नीचे बैठकर खुद से, बातें आज मैं करना चाहूँ
बारिश के पानी में कूदकर, जमकर छींटे खूब उड़ाऊँ
उड़ाके छीटें मार ठहाके, साथियों को अपने मैं हंसाऊँ
बिना किसी की फ़िक्र किये, बस आजाद मै रहना चाहूँ
ऐसी कोई विधि हो जो मै, उस वक़्त को फिर से मोड़ के लाऊँ
कोई हो ऐसा जरिया कि, उस दौर में मैं फिर वापस जाऊँ
कोई मुझको ये बतलादे, वो बचपन मैं कहां से लाऊँ?

जो आसमान में उड़ी तितलियाँ, उन्हें पास  मै कैसे बुलाऊँ?
उड़ाकर जहाज कागज के, मै अपने सपनों को पंख लगाऊँ
सुबह सुबह देरी  में उठकर, मै बेमन से स्कूल को जाऊँ
भारी मन से यह सोचूं कि, कैसे आज का दिन मैं बिताऊँ
पढ़ने का जो मन न करे तो, बहाना मार के घर को आऊँ
पर अब दफ्तर से आकर, घर के काम में मैं जुट जाऊँ
काम की चिंता इतनी सताये, सुकून कहीं न अब मै पाऊँ
कोई मुझको ये बतलादे, वो बचपन मैं कहां से लाऊँ?

माँ-पापा की डांट को मैं, सदा मस्ती में टालता जाऊँ
छोटा बेटा हूँ घर का तो, फिर से सारे लाभ  मैं पाऊँ
भाई बहन के प्यार का भी, मैं भरपूर लुत्फ़ उठाऊँ
कभी साथ में उनके खाऊं, तो कभी रूठ मैं झट से जाऊँ
कोई मुझे मनाने आये, तो मान भी मै एक पल में जाऊँ
कभी बेवजह ही यूँ ही बस मै, मम्मी पापा को खूब खिजाऊँ
आज हालातों के चलते मैं, साथ न अपनों के रह पाऊँ
कोई मुझको ये बतलादे, वो बचपन मैं कहां से लाऊँ?

कभी कैरम  कभी लूडो,ऐसे खेलों में मन मैं लगाऊँ
राजा बजीर का खेल मै खेलूं, माचिस की डिबिया के ताश बनाऊँ
पिट्ठू खेल के मन भर जाये, तो कंचे खूब मै खेल के आऊँ
हर रविवार की छुट्टी को मै, टीवी पर शक्तिमान चलाऊँ
यहाँ वहाँ के मेलों में मैं, संग पापा के घूमकर आऊँ
देख कर मेले की रौनक को, खुशी से मैं फूला न समाऊँ
आज पेड़ की छाँव में बैठा, मै तो बस ये सोचता जाऊँ
कोई मुझको ये बतलादे, वो बचपन मैं कहां से लाऊँ?

चेहरा लगा हो दोगलेपन का, ऐसा जीवन मै न चाहूँ
झूठी शान, दिखावेपन से, दूर ही मैं बस रहना चाहूँ
किये जो पागलपन मैंने, वो बचपन मैं कहाँ से लाऊँ ?
मेरी यादों का वो लड़कपन, वो बचपन मैं कहाँ से लाऊँ ?
मिल जाये सबकुछ जिदपन से, वो बचपन मैं कहाँ से लाऊँ ?
मिटटी सा घुल जाये जो छुटपन , वो बचपन मैं कहाँ से लाऊँ?
बिना द्वेष- बैर अपनापन, वो बचपन मैं कहां से लाऊँ ?
कोई मुझको ये बतलादे, वो बचपन मैं कहां से लाऊँ?

कोई हो ऐसा जरिया कि मै, उस दौर में मैं फिर वापस जाऊँ
कोई मुझको ये बतलादे, वो बचपन मैं कहाँ से लाऊँ?

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हरीश चमोलीमेरा नाम हरीश चमोली है और मैं उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल जिले का रहें वाला एक छोटा सा कवि ह्रदयी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे लिखने का शौक है और मैं अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

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