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रावण का जन्म और अमृत कुंड का रहस्य | रावण का इतिहास – 2

by Sandeep Kumar Singh
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आप रावण के पूर्व जन्मों के बारे में तो पढ़ ही चुके हैं ( यदि नहीं पढ़ा तो यहाँ क्लिक करें )  कि कैसे उसके जन्म का निर्धारण पहले ही हो चुका था। लेकिन हर काम से पहले उसकी एक योजना बनायीं जाती है। जो की आदेश देने वाले नहीं काम करने वाले बनाते हैं। इसमें आदेश देने वाला बस आदेश देता है जैसे की सनकादि मुनि ने जय विजय को श्राप दिया था। रावण का जन्म होने की पृष्ठभूमि तो इस प्रकार तैयार हुयी :-

रावण का जन्म

रावण का जन्म

ये कथा तब से शुरू होती है जब पृथ्वी पर माल्यवान, माई और सुमाली नमक 3 राक्षस हुए थे। तीनों ने ब्रह्मा जी की तपस्या की और बलशाली होने के वरदान प्राप्त किये। वरदान प्राप्त करते ही सबसे पहले वो शिल्पियों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा जी के पास गए और उन्हें शिभावन की भांति एक भवन बनाने को कहा।

उन्होंने उन राक्षसों को बताया कि त्रिकुट पर्वत एक सोने की लंका है। जो उन्होंने इंद्रा के कहने पर बनायीं थी। चूँकि इंद्र अमरावती में रहते हैं तो तुम लोग जाकर वहां अपना निवास स्थान बना सकते हो। इतना सुनते ही तीनों भाई ख़ुशी-ख़ुशी वहां चले गए। फिर उन तीनों का विवाह हो गया। माल्यवान का विवाह सौन्दर्यवती नमक स्त्री से हुआ। वसुधा का विवाह माली के साथ हुआ। वहीं सुमाली का विवाह केतुमती के साथ हुआ।

इसके बाद उनका उत्पात बढ़ने लगा। वे सभी देवों, ऋषि-मुनियों और साधू संतो को सताने लगे। ब्रह्मा जी के वरदान के कारण कोई उनको हरा भी नहीं पा रहा था। तब इंद्रा देवताओं सहित भगवान् शंकर के पास गए।  इतना सुनते ही तीनों भाई ख़ुशी-ख़ुशी वहां चले गए। फिर उन तीनों का विवाह हो गया। माल्यवान का विवाह सौन्दर्यवती नमक स्त्री से हुआ। परन्तु शंकर भगवान् ने उन्हें यह बताया कि वे राक्षस उनके द्वारा नहीं मारे जा सकते। इसलिए बेहतर ये होगा कि वे भगवान् विष्णु जी के पास जाएँ। ये सुनकर सभी देवता शंकर भगवान् की जय-जयकार करते हुए भगवान् विष्णु के पास चल दिए।

जब सभी देवताओं ने भगवान् विष्णु से उन्हें बचाने की विनती की तो भगवान् श्री हरी ने उन्हें इस समस्या का निवारण करने का आश्वासन दिया और भयमुक्त हो कर जाने को कहा। इसके बाद भगवान विष्णु और तीनों दैत्यों के बीच बहुत भयंकर लडाई हुयी। जिसमें माली मारा गया। जब दैत्य इस लड़ाई में कमजोर पड़ने लगे तो वे डर के मारे लंका छोड़ पाताल लोक में चले गए। इस प्रकार लंका खाली हो गयी और उन दैत्यों का आतंक शांत हो गया।

वही लंका फिर पिता विश्र्वा के कहने पर कुबेर ने फिर से बसाई। वे वहां अपने पुष्पक विमान सहित वहां रहते थे। एक दिन सुमाली ने पृथ्वी का भ्रमण करते हुए उन्हें पुष्पक विमान पर लंका से कहीं जाते हुए देखा। यह देख कर वह तुरंत पाताल लोक गए। वह पाताल लोक में जाकर सोचने लगे कि कब तक हम यूँ ही डरे सहमे से छिपते रहेंगे और हमारा भी साम्राज्य बढेगा। यही सोचता हुआ वह फिर पाताल लोक गया।

पाताल लोक पहुँचते ही सुमाली ने यह योजना बनायी कि अगर विश्र्वा ऋषि के साथ अपनी पुत्री कैकसी का विवाह हो जाए तो हमें देवताओं से भी तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी। जो हमारा साम्राज्य बढ़ाएगा। ऐसा सोच कर उन्होंने अपने मन की बात अपनी पुत्री कैकसी को बताई। कैकसी ने वही किया जो उसके पिता की इच्छा थी।



जब वह अपने पिता की यह इच्छा लेकर विश्र्वा मुनि के पास गयी। उन्हें सब कुछ बताया तो विश्र्वा मुनि ने उन्हें बताया कि वो गलत समय पर आई हैं। इस कारण उनके पुत्र राक्षसी प्रवृत्ति के होंगे। यह सुन कैकसी ने विश्र्वा मुनि से कहा,

” आप जैसे ब्रह्मवादी से मैं ऐसे दुराचारी पुत्र नहीं चाहती। अतः मुझ पर कृपा करें।”

यह सुन कर विश्र्वा मुनि ने कहा कि तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र मेरे वन्शानुरूप धर्मात्मा होगा। फिर विश्र्वा मुनि और कैकसी के 3 पुत्र – रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण हुए और एक पुत्री सुपनखा हुयी। रावण के 10 सिर होने के कारण उसका नाम दशग्रीव रखा गया।

चारों भाई बहन वन में रहते हुए बड़े होने लगे। विभीषण सारा दिन भक्ति में लीन रहते और कुम्भकर्ण जहाँ मन करे घूमा करता था। वो धर्मात्माओं और महर्षियों को पकड़ कर खा जाया करता था। उसका पेट कभी नहीं भरता था।

एक दिन कुबेर पुष्पक विमान में अपने पिता विश्र्वा मुनि से मिलने आये। उन्हें देख कर रावण की माँ कैकसी ने रावण से कहा,

” देखो दशग्रीव, तुम में और तुम्हारे भाई में कितना अंतर है। उसका तेज कितना प्रज्ज्वलित है। तुम भी कुछ ऐस करो कि उसके सामान हो जाओ।”

अपनी माता की ये इच्छा जान कर रावण ने यह प्रतिज्ञा ली की वो भी अपने भाई के बराबर पराक्रमी या उससे भी बढ़ कर होगा। ये सोच कर दशग्रीव अपने भाइयों सहित कठोर तप करने के लिए गोकर्ण नमक आश्रम में गया। उसने यह ठान रखा था कि वह तप कर के ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर उनसे वर प्राप्त करेगा।



रावण की नाभि में अमृत कहां से आया

रावण ने निरन्तर दस हजार वर्ष तक तपस्या की। एक हजार वर्ष पूरा होने पर वह अपना एक सिर होम में अर्पित कर देता था। इस तरह 9 हजार वर्षों तक वह अपने 9 सिर होम में अर्पित आकर चुका था। जब 10 हजार वर्ष पूरे होने को आये तो रावण 10वां सिर काटने को चला। तभी ब्रह्मा जी प्रकट हुए और रावण से कहा,

” हे धर्मज्ञ, तुझे जो वर मांगना है शीघ्र मांग। हम तेरे लिए क्या करें, जिससे तेरा परिश्रम व्यर्थ न जाए। “

पहले रावण ने अमरता का वरदान माँगा लेकिन ब्रह्मा जी ने कहा की ऐसा संभव नहीं है। तब रावण ने ये वर माँगा कि मनुष्य जाती छोड़ और कोई भी उसका वध न कर सके। फिर ब्रह्मा जी ने वर के साथ उसके कटे हुए 9 सिर भी उसको वापस कर दिए। ये वरदान ऐसे ही बना रहे इसलिए ब्रह्मा जी ने रावण की नाभि में एक अमृत कुंड स्थापित कर दिया जिससे रावण की मृत्यु तभी संभव होती जब उस कुंद से अमृत सूख जाता। अब विभीषण की बारी थी तो उन्होंने यह वर माँगा कि वो सदा धर्म के कार्यों में लगे रहें। कितनी भी पड़ी विपत्ति क्यों न आन पड़े बुद्धि सदा धर्म में ही बनी रहे

जब कुम्भकर्ण की बारी आई तो देवताओं ने ब्रह्मा जी से बिनती की कि ये दैत्य तो बिना शक्तियों के सबको खा जाता है और उत्पात मचाता है। फिर भी इसका पेट नहीं भरता अगर इसने वर प्राप्त कर लिया तो बहुत ही विनाश करेगा। देवताओं की इस समस्या का हल करने के लिए ब्रह्मा जी ने सरस्वती जी का स्मरण किया। जब सरस्वती जी प्रकट हुयीं तो ब्रह्मा जी ने कुम्भकर्ण की जीभ से वही कहलाया जो देवता चाहते थे। कुम्भकर्ण ने वरदान माँगा कि वह अनेक वर्षों तक सोता रहे। ब्रह्मा जी ने ऐसा ही वरदान दिया।

वरदान पाने के बाद तीनों भाई अपने पिता के आश्रम में गए और वहां ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे।

तो ये था रावण का जन्म और तपस्या द्वारा वरदान प्राप्ति  का किस्सा आगे की कथा पढ़ने के लिए बने रहें हमारे साथ। तब तक पढ़ें रावण के पूर्वजन्मों की और राक्षस योनि में जन्म लेने की कहानी।

आगे पढ़िए जो आपने शायद अब तक न पढ़ा हो रावण को मिले श्रापों और उसकी युद्ध में हुयी हारों के बाद उसके अंत की कथा। क्यों नहीं लगाया था रावण ने सीता को हाथ । अयोध्या के राजाओं से पहले भी युद्ध लड़ चुका था रावण। पढ़ने के लिए यहाँ पर क्लिक करें  :- रावण का इतिहास – 3

पढ़िए ये सुंदर प्रेरक प्रसंग :-

धन्यवाद।

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2 comments

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जय कुमार तिवारी मई 17, 2021 - 11:30 पूर्वाह्न

मैं एप पत्रकार हूं आपके नाम से आपके आर्टिकल को प्रकाशित करने के लिए आप हमें प्रतिक्रिया भेजने का फैसला कर सकते हैं।मेरा मक़सद आपके द्वारा लिखित आर्टिकल से लोगों को रू-ब-रू कराना है।

Reply
Sandeep Kumar Singh
Sandeep Kumar Singh मई 17, 2021 - 11:09 अपराह्न

जय कुमार तिवारी जी आप हमसे व्हाट्सएप्प नंबर 9115672434 पर संपर्क करें…

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