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नशा मुक्ति पर कहानी- बुझता चिराग :- नशा और युवा पीढ़ी

by Sandeep Kumar Singh

आज कल हमारे देश में नशे (Drug Addiction) कि समस्या बढ़ती ही जा रही है। सिगरेट, तम्बाकू और गुटखे जैसे नशे तो आम ही देखे जा सकते हैं। लेकिन यही नशे कई बार आगे चलकर विकराल रूप धर लेते हैं और बहुत सी समस्याएँ कड़ी कर देते हैं। जिसका सामना उनके परिवार वालों को करना पड़ता है। इसी लिए मैंने नशा मुक्ति पर कहानी लिखने कि कोशिश की है।

नशा मुक्ति पर कहानी | बुझता चिराग – नशा और युवा पीढ़ी

नशा मुक्ति पर कहानी

अमावस्या की रात थी। हॉस्टल के सभी कमरों की लाइटें बंद हो चुकी थीं। मौसम में कुछ ठंडक थी। ठंडी हवा चल रही थी। तीसरी मंजिल के आठवें कमरे की खिड़की पर समर काले आसमान की तरफ देख रहा था। तभी दरवाजा खुलने की आवाज आई।

“अरे! समर तू सोया नहीं अभी तक?”
समर ने उस शख्स की और देखा और फिर आसमान में नजर गड़ा ली।
“अबे मैं कुछ पूछ रहा हूँ। तू कौन सा मंतर पढ़ रहा है?”
“क्या मेरी जिंदगी में कभी पूर्णिमा का चाँद चमकेगा या यूँ ही अमावस्या की काली अँधेरी रात छायी रहेगी?”
“हाहाहा………… ये पूर्णिमा कौन है समर ? तूने कभी बताया नहीं?”

समर ने चिराग की तरफ देखा। चिराग उसका रूममेट है। दोनों को एक साथ रहते एक साल हो गए हैं। चिराग और समर दोनों इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं और एक साथ एक ही कमरे में रहते हैं। चिराग इस एक साल में काफी बदल गया था। वह ड्रग्स लेने लग गया था। इसका कारण तो समर को नहीं पता था। समर ने उसे कई बार समझाया भी कि ऐसी करना अच्छी बात नहीं हैं लेकिन चिराग कुछ सुनने को तैयार ही नहीं था। आज भी चिराग ड्रग्स लेकर आया था।

“तुझे होश आये तब पता चलेगा ना। 24 घंटे तो तू किसी और ही दुनिया में रहता है।“
“क्या हुआ यार? इतना उदास क्यों लग रहा है?”
“कुछ नहीं बस ऐसे ही”
“अपने भाई को नहीं बताएगा?”

समर अब भी खिड़की से आसमान को ताक रहा था। मानो वो किसी चीज के होने का इंतजार कर रहा हो। सोच रहा हो कि उसकी उलझी हुयी जिंदगी को सुलझाने वाला भी कोई चाँद इसी अमावस्या के बाद आएगा।

“ अरे ओ देवदास की औलाद बताता क्यों नहीं क्या हुआ? जल्दी बता नहीं तो नींद आ जाएगी मुझे।”
चिराग ने दुबारा समर से पूछा।
“तू तो वैसे भी नींद में रहता है। कुछ बताने का फ़ायदा क्या।“
“चिराग जो बेड पर बैठ हुआ था जाकर समर के पास खड़ा हो गया और बोला,

“ ये अमावस की काली रात देख रहा है तू। चाँद अपनी पूरी चांदनी एक ही दिन बिखेर पाता है और वो भी सूरज से रोशनी उधार लेकर। ऐसी जिंदगी का क्या करना जो किसी से उधार लेकर जी जाए। सच्चाई ये है की अमावस्या का वजूद सच्चा है।“
इतना कहकर चिराग समर की पीठ थपथपाता हुआ बेड पर लेट जाता है और कहता है,

“इसीलिए मैं इस अमावस्या के अंधेरे को पसंद करता हूँ और एक नींद में रहता हूँ……….. चल छोड़ ये बता तू इतना परेशान क्यों है आज?”
समर ने खिड़की पर रखे हुए हाथ हटाये और चिराग के पैरों के पास उसकी तरफ पीठ कर के बैठ गया। फिर उसने अपना दर्द बयां करना शुरू किया,

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“एक सिंगर बनने की तमन्ना मेरी बचपन से थी। स्कूल में भी सब मेरी आवाज का लोहा मानते थे। कहते थे की तू जरूर एक दिन दूसरा मोहम्मद रफ़ी बनेगा। मैंने तो स्कूल में सिंगिंग क्लासेज भी लेना स्टार्ट कर दिया था। मैंने दिन रात एक कर दिया और इसी चक्कर में मैं फाइनल एग्जाम में फेल हो गया। पिता जी को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने मेरी सिंगिंग क्लासेज बंद करवा दी। मेरी हर तरह की एक्स्ट्रा एक्टिविटी बंद कर दी गयी। दोस्तों से मिलना-जुलना भी बंद करवा दिया और……”

इतना कह कर वह जैसे ही चिराग की तरफ मुड़ा तो उसने देखा कि चिराग सो चुका था। ये देख समर चुप हो गया और लेट गया। पुरानी बातें सोचते-सोचते न जाने उसे कब नींद आ गयी।

सुबह हुयी समर तैयार हो रहा था और चिराग अभी सो कर भी नहीं उठा था।
“उठ…उठ ना, देख सूरज सर पर चढ़ आया है।”
“सोने दे न….”
“अबे उठ क्लास अटेंड करनी है या नहीं?”
“ओ तेरी! मैं तो भूल ही गया था। तू रुक अकेले मत जाना अमीन अभी आया दो मिनट में…”
कहता हुआ चिराग बाथरूम में चला गया।

समर बैठा किसी अनजानी दुनिया में खो रहा था। उसे याद आ रहा था अपना घर कैसे उसके पिता जी उस से हर पल यही उम्मीद करते थे कि वह अपनी पढाई पर ध्यान दे और उनका नाम रोशन करे।

कई बार उसे ना पढने के कारण पिता के गुस्से का सामना करना पड़ता। माँ भी पिता कि कई बात को नहीं काटती थी। समर कि बड़ी बहन उसे बहुत प्यार करती थी। उसे विश्वाश था कि वो किसी दिन सफलता जरुर प्राप्त करेगा। जब कभी पिता जी गुस्सा होते थे तो माँ की जगह उसकी बड़ी बहन उसे समझाती थीं,

” अरे! तू फिर से रोने लगा। तुझे कितनी बार समझाया है कि पिता जी तेरे भले के लिए तुझ पर गुसा करते हैं।”
“कैसा भला ? इस तरह डांट खा कर कौन सा भला हो रहा है मेरा? “,
अपनी बहन कि बात को कटते हुए समर ने कहा।



“गुस्सा इसलिए होते हैं कि उन्हें तुमसे कोई उम्मीद है। उन्हें भरोसा है कि तुम ऐसा कर सकते हो। अगर उन्हें ये लगता कि तुम कुछ नहीं कर सकते तो वो तुम्हें कभी कुछ ना कहते। और वैसे भी भावनाएं तो अपनों के सामने ही प्रकट की जाती हैं।”

अपनी बहन कि बातें सुन समर के पास बोलने के लिए कुछ न बचता। बड़ी बहन होने के नाते उसे पता था कि किस स्थिति को कैसे संभालना है।
“समर……समर…. अबे मर तो नहीं गया ?”

समर के अतीत के ख्यालों कि दुनिया को इस आवाज ने तोड़ दिया। उसने देखा तो पास में ही चिराग खड़ा था। समर ख्यलो९न में इतना खो गया था कि उसे पता ही नहीं चला चिराग कब तैयार हो कर उसके सामने खड़ा हो गया।

“कुछ नहीं यार ऐसे ही बस..”
“तो फिर चलें?”
” हाँ जरुर।”
दोनों क्लास अटेंड करने के लिए चल पड़े।

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क्लास ख़तम हुयी। दोनों कॉलेज के बीचों बीच बनी बास्केटबाल कि सिमेंटेड ग्राउंड के किनारे बनी कुर्सियों पर बैठ गए। चिराग ने समर को दो मिनट बैठने को कहकर कहीं चला गया। समर ने पीछे मुड़ कर देखा तो चिराग उसी कॉलेज में पढने वाले रॉकी से मिलने गया था।

रॉकी पिछले ५ सालों से इस कॉलेज में पढ़ रहा है। वो पास तो हो नहीं पा रहा या होना नहीं चाहता इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता है । लेकिन पिछले पांच सालों में उसने अपनी ऐसी पहचान बना ली थी जिसके बारे में किसी को न ही पता चले तो अच्छा है। चिराग जल्द ही मिल के समर के पास वापस आ गया।

“चिराग तुझे इस सब में क्या मज़ा आता है? तुझे पता है न इन सब चीजों से कितना नुक्सान होता है?”
“समर यार तू फिर लेक्चर मत स्टार्ट कर देना। पहले ही क्लास अटेंड कर के मैं बहुत बोर हो गया हूँ ।”
“पर सुन तो…..”
“शाम को सुनता हूँ अभी मुझे कहीं जाना है शाम को मिलते हैं हॉस्टल में।”
कहता हुआ चिराग वहां से चला गया।

समर सोच रहा था उसका भविष्य कहाँ जाएगा। वो अभी भी अंधकार के एक दरिया में डूब रहा था जहाँ स उसे बहार निकलने के लिए कोई किनारा नजर नहीं आ रहा था।



शाम को समर कुर्सी पर बैठा असाइनमेंट तैयार कर रहा था।  तभी चिराग लडखडाता हुआ कमरे के अन्दर पहुंचा।
“चिराग संभाल के…..”
गिरते हुए चिराग को समर ने संभालते हुए जोर से कहा।
“संभालने को तू है ना…”

समर ने उसे आराम से बेड पर लिटाया।
“क्यों करता है ये सब जब तू खुद पर कण्ट्रोल नहीं रख पाता ?”
“कण्ट्रोल न रहे इसीलिए तो ये सब करता हूँ।”
“मतलब क्या है तेरा ? एससी कौन सी बात है जो तू खुद पर कण्ट्रोल नहीं रखना चाहता?”
“छोड़ न तू ….पढ़…..मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर”
“नहीं मुझे जानना है ऐसी कौन सी बात है जो तू ये सब करता है?”

“बहुत छोटा था मैं जब मुझे  स्कूल के हॉस्टल  में मुझे मेरे माता पिता अकेला छोड़ आये थे उस टाइम मुझे उनकी जरुरत थी। सबके माता पिता उन्हें मिलने आते थे लेकिन मेरे माता पिता सिर्फ रिजल्ट वाले दिन ही आते थे। छुट्टियों में भी मेरी स्पेशल क्लासेज लगा दी जाती थीं। अब जब कॉलेज में एडमिशन ली तो फिर होस्टे में डाल दिया। उस अकेलेपन का दर्द अभी मेरे सीने में उठता है और मुझे महसूस करवाता है कि मई इस दुनिया में अकेला हूँ बिलकुल अकेला।”

“चुप कर तूने आज ज्यादा चढ़ा ली है। सो जा सुबह बात करते हैं।”
चिराग नशे कि आगोश में था इसलिए जल्दी ही सो गया।वहीँ समर के दिमाग में एक अजीब सी जंग छिड़ चुकी थी। वो समझ नहीं पा रहा था कि क्या इन सब से निजात पाने का यही  एक तरीका है। घटा तो उसके साथ भी कुछ ऐसा ही था।

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9 comments

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sanjay kumr August 4, 2019 - 3:53 PM

kya apki ejajat ho to me es story ko meri school me compition me sunana chahuga wakei apki es kriti par apko best story0writer ka khitab milna chaiye

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SATISH KUMAR April 19, 2018 - 1:03 PM

धन्यावाद भाई जी आप की कहानी को पढ कर आँखों में आँसू आ गये। परमेश्चवर आप को ओर भी इस तरह की कहानीयों को लिखने की बुद्धि दे तांकि आप की कहानियां किसी की नाश होती जिन्दगी को बचा सकें। एक बार फिर आप का दिल से धन्यावाद।

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किसन सिद्ध February 19, 2018 - 10:49 AM

मुझे बहुत अच्छी लगी आप की कहानी

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navin January 18, 2018 - 10:54 PM

Bahut acha Story hai
Kal mai aur mere dost ek clg me is vishay par ek
Natak prastut kar rahe hai dua kijiye ki humara yah kary safal ho taki hum jo sathi hai jo nashili chijon ka sewan kar rahe hai vo humare natak se prabhawit ho aur nashe ko bhi chd de…
Jai hind

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Sandeep Kumar Singh
Sandeep Kumar Singh January 19, 2018 - 9:59 AM

नवीन जी आपके नाटक के लिए हमारी ओर से शुभकामनाएं।

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Abhi November 4, 2017 - 11:33 PM

Excellent

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Sandeep Kumar Singh
Sandeep Kumar Singh November 5, 2017 - 7:10 AM

Thanks Abhi Bro..

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जमशेद आज़मी June 23, 2016 - 10:35 AM

नशा मुक्ति पर बहुत ही बेहतरीन कहानी की प्रस्‍तुति। भारत में नशा मुक्ति आसान काम नहीं है। इसमें सरकारों और लोगों की इच्‍छाशक्ति की बहुत सख्‍त जरूरत है।

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Mr. Genius
Mr. Genius June 23, 2016 - 12:22 PM

धन्यवाद जमशेद आज़मी जी, काम तो वाक़ई आसान नहीं है लेकिन जमीर जाग जाये तो क्या नहीं हो सकता। जरुरत है तो कुछ लौ जलाने वालों की मशालें अपने आप जल उठेंगी।

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