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रावण को मिले श्रापों और हारों की कथा | रावण का इतिहास – 3

by Sandeep Kumar Singh

रावण के पूर्वजन्मों का इतिहास और उसके जन्म व मृत्युकुंड का रहस्य तो आप पहले ही पढ़ चुके हैं। अगर नहीं पढ़ा तो पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें । अब हम जानते हैं की वरदान प्राप्ति के बाद रावण के जीवन में क्या हुआ? तो आइये पढ़ते हैं ‘ रावण को मिले श्रापों और हारों की कथा ‘ :-

रावण को मिले श्रापों और हारों की कथा

रावण को मिले श्रापों और हारों की कथा

छायाचित्र स्रोत: रवि वर्मा

वरदान प्राप्त करने के बाद रावण के अत्याचार बहुत बढ़ गए। उसने सब पर आक्रमण कर अपना साम्राज्य बढ़ाना आरम्भ कर दिया। परन्तु परेशानी की बात ये थी कि वो बहुत अनुचित ढंग से ये सब कर रहा था। जब उसके भाई कुबेर को इस बात की जानकारी हुयी तो उन्होंने एक दूत भेजा। जिसके द्वारा उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि उसे यह सब नहीं करना चाहिए इसके परिणाम उसके लिए घातक हो सकते हैं।

इस बात का रावण पर उल्टा असर हुआ। उसने दूत को मरवा दिया और स्वयं कुबेर पर आक्रमण कर दिया। इस हमले में रावण जीता और कुबेर का पुष्पक विमान ले आया। ये विमान मन की गति से चलता था। जब वह युद्ध जीत कर पुष्पक विमान से लंका जा रहा था। तभी अचानक उसका पुष्पक विमान एक पर्वत पर रुक गया। अभी रावण इसके कारण के बारे में सोच ही रहा था कि तभी नन्दीश्वर जी वहाँ आ गए।



रावण ने देखा की नन्दीश्वर जी का मुंह कुछ-कुछ बन्दर जैसा था। इस बात का जब रावण ने मजाक उड़ाया तो नन्दीश्वर जी ने उसे श्राप दिया कि जिस बन्दर जैसे मुख के कारण उसने उनका मजाक उड़ाया है। वही बन्दर ही उसके वंश की समाप्ति का आरंभ करेंगे। और ये भी बताया कि इस समय यहाँ भगवान् शिव और पार्वती जी एकांत में समय व्यतीत कर रहे हैं। इस कारण यहाँ से आगे कोई भी नहीं जा सकता। वह किसी और मार्ग से चला जाए।

रावण को अपने पराक्रम पर बहुत गर्व था। उसने इसी अहंकार में कहा कि,

“जो पर्वत उसके मार्ग में विघ्न बना है। वो उसे ही उखाड़ फैंकेगा। “

जैसे ही रावण ने वो पर्वत उठाया। तभी भगवान शिव और पार्वती जी को इसका आभास हुआ। रावण का अहंकार ख़त्म करने के लिए भगवान् शंकर ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को दबाया। इस कारण रावण का एक हाथ पर्वत के नीचे आ गया। तब जाकर उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। अपनी गलती सुधरने के लिए अपने मंत्रियों की सलाह पर उसने भगवन शिव की स्तुति करनी आरंभ की।

1000 वर्ष तक वह भगवान् शंकर की स्तुति करता रहा। तब जाकर भगवान् शिव उस पर प्रसन्न हुए। उस समय भगवान् शंकर ने उसे चन्द्रहास नाम की तलवार आशीर्वाद स्वरुप दी। लेकिन ये भी कहा कि अगर कभी इस तलवार का अपमान किया तो यह तलवार स्वतः ही वापस मेरे पास चली आएगी। तब रावण ख़ुशी-ख़ुशी वह तलवार लेकर वहाँ से चला गया।



उसके जीवन में बस इतना ही अच्छा जीवन लिखा। नन्दीश्वर के श्राप के बाद उसे कई और श्राप मिले और उसे कई बार हार का सामना करना पड़ा। उसकी मृत्यु तो बहुत पहले हो जाती लेकिन परिस्थतियों और उसके परिवार के साथ के कारण ऐसा हो न सका।

एक बार रावण हिमालय पर्वत पर घूम रहा था। तभी अचानक उसे एक सुन्दर कन्या दिखाई दी। जो तपस्या में लीन थी। रावण ने उस कन्या से उसका परिचय पूछा और ये भी पूछा की वो इतनी कम उम्र में घर बसने की जगह इतनी काठी तपस्या क्यों कर रही है? तब उस कन्या ने जवाब दिया कि वो बृहस्पति के पुत्र कुशध्वज की पुत्री वेदवती है। उसके पिता की ये इच्छा थी कि उसका विवाह भगवान् विष्णु से हो। पिता की इसी इच्छा की पूर्ती के लिए वो इस पर्वत पर तपस्या कर रही थी।

रावण ने उसे ऐसा न करने को कह कर अपनी रानी बनने का प्रस्ताव रखा। जिसे वेदवती ने ठुकरा दिया। लेकिन रावण के मन में काम सवार था। उसने जैसे ही वेदवती के केश पकड़े। वेदवती ने अपने तपोबल से अपने बाल काट दिए। वो नहीं चाहती थी की उसकी तपस्या का फल रावण के कारण व्यर्थ जाए। इसलिए उसने खुद को अपने तपोबल से भस्म कर लिया एवं रावण को यह श्राप दिया कि अगले जन्म में वह ही रावण की मृत्यु का कारण बनेगी। और वाही वेदवती सीता के रूप में जन्मी थीं।

रावण ने इस बात पर ध्यान न दिया और आगे बढ़ गया। उसने अपने आक्रमण जारी रखे। सब पर आक्रमण करते हुए रावण अयोध्या पहुंचा। जहाँ उसका सामना अयोध्या के तत्कालीन राजा अनरण्य के साथ हुआ। राजा अनरण्य ने रावण को वापस चले जाने के लिए कहा लेकिन रावण ने तो युद्ध करने की ठानी थी। जब युद्ध अंतिम समय में पहुँच गया और राजा अनरण्य अपनी मृत्यु के पास थे। तब रावण ने उनसे कहा कि आमोद-प्रमोद में लीन होने के कारण तूने मेरी महिमा नहीं सुनी।

राजा से यह बात सहन न हुयी और उन्होंने कहा,

“तूने इक्ष्वाकु वंश का अपमान किया है। अतः यदि मैंने दान दिया हो, होम किया हो तो मेरा वचन है कि इक्ष्वाकु कुल में दशरथी राम उत्पन्न होंगे। जो तेरा वध करेंगे।”



इतना कह कर महाराज अनरण्य मृत्यु को प्राप्त हुए।

उसके वहाँ से जाते समय रावण को रास्ते नारद मुनि मिले। उन्होंने रावण से कहा कि तुम मनुष्यों पर अत्याचार क्यों करते हो। वो तो पहले ही अपने जीवन से दुखी हैं। किसी को परिवार की चिंता, किसी को स्वस्थ्य की और किसी को धन की। तुम्हें जीतना ही है तो यमराज को जीतो जो सब के प्राण हरते हैं। इतना सुन रावण यमराज से युद्ध करने के लिए यमलोक को चल दिए।

रावण और यमराज में भयंकर युद्ध हुआ। जब यमराज ने देखा कि रावण आसानी से नहीं हारेगा तो उन्होंने उसे मारने के लिए अपना पाश निकाला। उसी समय वहां ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने यमराज से रावण को न मारने के लिए कहा। क्योंकि इससे उनका वरदान झूठा हो जाता। ब्रह्मा जी के वचनों का पालन करते हुए यमराज युद्ध छोड़ कर वहीं अन्तर्धान हो गये।

रावण की युद्ध करने की लालसा अभी ख़त्म न हुयी थी। इसलिए वो एक बार फिर से अयोध्या जा पहुंचा। इस बार उसका सामना अयोध्या नरेश मानधाता से हुआ। इस युद्ध में एक फिर कड़ी टक्कर हुयी। अंत में महाराज मानधाता ने रावण को मारने के लिए शिव जी द्वारा दिए गए पशुपात को हाथ में लिया। तब रावण को बचाने के लिए उसके दादा पुलस्त्य मुनि और गालव मुनि ने आकर रावण को धिक्कारा। जिससे रावण को बहुत ग्लानी हुयी। तब पुलस्त्य मुनि ने महाराज मानधाता और रावण की मैत्री करवाई।

जीवन में इतना कुछ घट रहा था लेकिन रावण सुधरने का नाम नहीं ले रहा था। एक दिन उसने देखा की रम्भा सज-धज कर नलकुबेर ( कुबेर के पुत्र ) के पास जा रही थी। मार्ग में देख कर रावण का काम उसके सिर पर चढ़ गया। उसने रम्भा के सामने अपने मन की बात रखी। जब रम्भा ने अपनी स्वीकृति न दी तो रावण ने जबरदस्ती रम्भा का बलात्कार कर दिया।

रम्भा ने जब यह बात जाकर नलकुबेर को बताई तो नलकुबेर ने आवेश में आकर रावण को श्राप दिया कि यदि उसने आज के बाद किसी भी स्त्री का बलात्कार करने का प्रयास किया तो उसके सिर के सात टुकड़े हो जाएँगे। जब रावण को इस बात का पता चला तो उसने कभी किसी स्त्री का बलात्कार न किया। इससे पहले विभीषण ने भी रावण को कई बार ये कुकृत्य करने से मना किया था। ये श्राप ही कारण था कि रावण ने सीता का हरण करने के बाद उनके साथ जबरदस्ती नहीं की।



अब रावण को एक बार फिर बेइज्जती का सामना करना पड़ा। इस बार उसने महिष्मती के राजा अर्जुन से युद्ध किया। रजा अर्जुन के आगे रावण की एक न चली और उन्होंने रावण को बंदी बना लिया। कई दिनों तक बंदी बने रावण पर एक बार उनके दादा मुनि पुलस्त्य को दया आई और वे उसे छुड़ाने महिष्मती गए। राजा अर्जुन ने उनका स्वागत बहुत अच्छे ढंग से किया।

मुनि पुलस्त्य के आने का कारण जब राजा अर्जुन को पता चला तो उन्होंने बिना कोई प्रश्न किये प्रसन्नता के साथ रावण को छोड़ दिया। मुनि पुलस्त्य ने राजा अर्जुन से भी रावण की मैत्री करवा दी और उसे लेकर वापस आ गए।

इसके बाद उसके जीवन में एक ही घटना बची थी और वो थी सीता हरण की। इस से तो शायद ही कोई अनजान हो कि कैसे जब लक्ष्मण ने सूर्पनखा के नाक और कान काट दिए थे तो रावण ने बदला लेने के लिए सीता का अपहरण कर लिया था। उसके बाद राम जी ने सुग्रीव सेना और हनुमान जी की सहायता से रावण के साम्राज्य का अंत किया और उसे मार कर सीता को वापस छुड़वा कर लाये।

रावण की मृत्यु के दिन ही तो रावण दहन किया जाता है। अब इतने तो समझदार आप हैं ही। इसी के साथ रावण को मिले श्रापों और हारों की कथा | रावण का इतिहास – 3 समाप्त हुआ।

जानिये रावण के परिवार के परिवार के बारे में यहाँ क्लिक करें

धन्यवाद।

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