Home कहानियाँ सफ़र बेबसी से बहादुरी तक | उतर-चढ़ाव से बदलती हुयी जिंदगी की कहानी

सफ़र बेबसी से बहादुरी तक | उतर-चढ़ाव से बदलती हुयी जिंदगी की कहानी

by Sandeep Kumar Singh

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ये एक ऐसी कहानी है जिसके आधे हिस्से में सभी लोगों की कहानी है लेकिन बाकी का आधा हिस्सा उन लोगों की कहानी है जो अपनी जिंदगी बदलने के लिए गिरने के बाद फिर उठते हैं। आइये पढ़ते हैं हमारी जिंदगी की कहानी :- सफ़र बेबसी से बहादुरी तक ।

सफ़र बेबसी से बहादुरी तक

सफ़र बेबसी से बहादुरी तक | उतर-चढ़ाव से बदलती हुयी जिंदगी की कहानी

आज फिर बॉस से डांट पड़ी। प्रतीक के मन में न जाने क्या-क्या विचार सागर की लहरों की तरह आ और जा रहे थे। जैसे ही वह बॉस के केबिन से बाहर निकला। सभी उसकी तरफ देखने लगे। प्रतीक के चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे वो कहना चाह रहा था कि उसकी कोई गलती नहीं। गलती किस इन्सान से नहीं होती। इसका मतलब ये तो नहीं कि वो उस गलती के लिए दोषी हो गया।

पर ये दुनिया इसे कौन समझाए? इसे तो बस दूसरों में ही गलतियाँ नजर आती हैं। प्रतीक को इस से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। ये उसके साथ पहली बार नहीं हो रहा था। पिछले 2-3 महीने में उसे कई दफा बॉस से डांट पड़ चुकी थी। और इस बार तो उसे लास्ट वार्निंग भी मिल गयी थी। प्रतीक बेबस हो चुका था। वो अपनी जिंदगी से हार मान चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा उसके साथ ही क्यों हो रहा था? क्या वो दुनिया में अकेला ऐसा इन्सान है जिसके साथ ऐसा हो रहा है?

जब इंसान जिम्मेवारियों के बोझ तले दबा होता है तब उसे बस एक ही राह नजर आती है जिस पर वह चल रहा होता है। चाहे उसके बगल में ही जाने वाला रास्ता किसी बड़ी मंजिल की और जाता हो। लेकिन जब इन्सान उस राह पर भी सही ढंग से न चल पा रहा हो तो दूसरे राह पर चलने की उम्मीद भी कैसे कर सकता है?

यही स्थिति प्रतीक की भी थी। किसी तरह 5 बजे और प्रतीक घर की तरफ रवाना हुआ। घर पहुँचते ही सीधा बाथरूम में गया। हाथ मुंह धो कर कपड़े बदल अपनी साइकिल पर दूर समंदर किनारे चला गया। क्या करूँ? कैसे करूँ सही काम? क्यों होती हैं इतनी गलतियाँ? आँखें बंद की। और चला गया उन पुराने दिनों में जिन दिनों में उसने गलतियाँ की थीं।

दिन को अलविदा कहते सूरज की लालिमा ने सारे आकाश को संत्री रंग में ऐसे रंग दिया जैसे फिजाओं में आग फ़ैल गयी हो। लेकिन इस आग में तपिश नहीं एक अद्भुत सी ठंडक थी। जिसके बाद एक……एक ऐसा अँधेरा होने वाला था जो सरे वातावरण को सूरज की तपिश के बाद एक आनंदमयी एहसास देने वाला था। हवा भी अपनी मस्ती में बह रही थी।

न जाने कब हवा का रुख थोडा तेज हो गया। लेकिन प्रतीक पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा। तभी नभ में हवाओं में तैरते पक्षियों के कोलाहल का मधुर संगीत प्रतीक के कानों में पहुंचा। जैसे ही प्रतीक ने आँख खोली उसने देखा कि बहुत ज्यादा तूफ़ान आ रहा था। पक्षी न चाहते हुए भी अपनी दिशा में उड़ नहीं पा रहे थे। फिर भी उन्होंने उड़ने की जिद नहीं छोड़ी थी। किसी तरह हवा का सामना करते हुए वो अपने घरों की तरफ बढ़ रहे थे। न जाने उसने इस बात में ऐसा क्या देख लिया कि उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी। और उसी वक़्त हवा को चीरती हुयी बारिश की एक बूँद उसके माथे पर आ गिरी।

वो शायद जिंदगी के असल मायने समझ चुका था। वो समझ चुका था कि जिंदगी के रास्ते में रुकावटों के आने का मतलब ये नहीं के रास्ता ख़तम हो गया है। हमारी चाल धीमी होने का ये मतलब नहीं कि हम तेज नहीं हो सकते और रुक जाने का मतलब ये नहीं होता कि दुबारा चल नहीं सकते। जब एक पक्षी अपना हौसला नहीं हार रहा तो मैं तो एक इन्सान हूँ। मैं भी तो अपने आपको बदल सकता हूँ।

क्या हुआ जो आज हवा धकेल रही है मुझे। कभी तो ये मेरा साथ देगी। कभी तो मेरी जिंदगी की किश्ती बुरे वक़्त के समंदर से निकल कर खुशियों के किनारे पर पहुंचेगी। मैं अपनी मेहनत से अपने मुकद्दर को बदलूँगा। उस पल तो उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके कानों में कोई मंत्र फूंक दिया हो। जिससे उसकी भटकी हुयी मंजिल उसके सामने आकर खड़ी हो गयी हो। अब बस जरुरत थी तो उसके चलने की।

इधर सारी रात बारिश और तूफ़ान चलता रहा। उधर प्रतीक के मन में उठ रहे सवालों का तूफ़ान शांत हो चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे बाहर हो रही बारिश ने प्रतीक के अन्दर परेशानियों की उड़ रही धूल को साफ़ कर दिया हो।

अगली सुबह जब सूरज निकला तो उसकी चमक कुछ अलग ही थी। ऐसी चमक हर रो नहीं होती थी। पंछी चहचहा रहे थे।ऐसा लग रहा था जैसे कल अँधेरी रात के बीच किसी ने सब कुछ धो डाला हो। एक वो दिन गुजरा और आगे के दिन जैसे-जैसे आते गए प्रतीक ने अपना एक अलग ही मुकाम बना लिया और कुछ ही सालों में उसने अपनी खुद की एक कंपनी बना ली।

दोस्तों ऐसे ही हमारी जिंदगी में कई परेशानियाँ और समस्याएँ आ जाती हैं। उस समय हमें ऐसा लगता है जैसे हमारी जिन्दगी रुक गयी है। लेकिन हमारी जिंदगी तब नहीं रूकती जब परेशानी या समस्या आती है। हमारी जिंदगी तब रुक जाती है जब हम खुद को कमजोर समझ कर उस परेशानी और समस्या को दूर करने का प्रयास नहीं करते। प्रेरणा के लिए किसी खास क्रिया या किसी ख़ास स्थिति कि आवश्यकता नहीं होती।

प्रेरणा पत्थरों को चीरती नदी से भी मिल सकती है और नदी को रोकते बाँध से भी। जिस तरह नदी पत्थर को काट कर अपना रास्ता बना लेती है उसी तरह पत्थरों को क्रमबद्ध तरीके से लगा कर नदी को भी रोका जा सकता है। आवश्यकता है तो बस एक सही सोच की। कोई बारिश का आनंद उठता है तो किसी को ये बारिश ही आफत लगती है।
हमें भी प्रश्नों और परेशानियों को छोड़ उनके उत्तर ढूँढने और उन्हें सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।

आपको ये लेख ‘ सफ़र बेबसी से बहादुरी तक ‘ कैसा लगा अपने विचार हम तक जरुर पहुंचायें।

पढ़िए जीवन को प्रेरित करने वाली कहानियां :- 

धन्यवाद।

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3 comments

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salman Qureshi June 15, 2021 - 11:34 AM

Very good

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HindIndia December 30, 2016 - 5:02 PM

As usual शानदार पोस्ट …. Bahut hi badhiya …. Thanks for this!! :) :)

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Mr. Genius
Mr. Genius December 30, 2016 - 10:32 PM

Dhanywad HindIndia ji……

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