कबीर के दोहे और उनके अर्थ | कबीर के प्रसिद्ध दोहे भाग – 4

कबीर के दोहे और उनके अर्थ

कबीर के दोहे और उनके अर्थ

कबीर के दोहे और उनके अर्थ :- कबीर दास जी ने मनुष्यों को मनुष्यता का पाठ पढ़ाने के लिए दोहों की रचना की। कबीर दास जी के दोहे को पढ़कर इंसान में सकारात्मकता आती है। मनुष्य अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित होता है। इसीलिए हमने अपने पाठको के लिए कबीर के दोहे और उनके अर्थ लेके आये है। कबीर दास जी के दोहे के संकलन का ये चौथा भाग है।
पहला भाग यहाँ से पढ़ सकते है- कबीर के दोहे भाग १

पढ़िए कबीर के दोहे और उनके अर्थ –

छिनहिं चढै छिन उतरै, सों तो प्रेम न होय।
अघट प्रेमपिंजर बसै, प्रेम कहावै सोय।।

अर्थ :- वह प्रेम जो क्षण भर में चढ़ जाता है और दुसरे क्षण उतर जाता है वह कदापि सच्चा प्रेम नहीं हो सकता क्योंकि सच्चे प्रेम का रंग तो इतना पक्का होता है कि एक बार चढ़ गया तो उतरता ही नहीं अर्थात प्रेम वह है जिसमें तन मन रम जाये।


कबीर सुमिरण सार है, और सकल जंजाल।
आदि अंत मधि सोधिया, दूजा देखा काल।।

अर्थ :- संत कबीर जी कहते है की प्रभु का ध्यान सुमिरन , भजन, कीर्तन और आत्म चिन्तन ही परम सत्य है, बाकी सब झूठा है। आदि अन्त और मध्य के विषय में विचार करके सब देख लिया है। सुमिरन के अतिरिक्त बाकी सब काल के चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं।


कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय।
तब कुल काको लाजि है, चारिपांव का होय।।

अर्थ :- कुल की मर्यादा के मोह में पड़कर जीव पतित हो गया अन्यथा यह तो हंस स्वरुप था, किन्तु उसे भूलकर अदोगति में पड़ गया। उस समय का तनिक ध्यान करो जब चार पैरों वाला पशु बनकर आना होगा। तब कुल की मान मर्यादा क्या होगी? अर्थात अभी समय है , शुभ कर्म करके अपनी मुक्ति क उपयोग करो।


सार शब्द जानै बिना, जिन पर लै में जाय।
काया माया थिर नहीं, शब्द लेहु अरथाय।।

अर्थ :- सार तत्व को जाने बिना यह जीव प्रलय रूपी मृत्यु चक्र में पड़कर अत्यधिक दुःख पाता है। मायारूपी धन संपत्ति और पंचत्तत्वों में मिल जायेगा और धन संपत्ति पर किसी अन्य का अधिकार हो जायेगा। अतः काया और माया का अर्थ जानकर उचित मार्ग अपनाये।


गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन सब निष्फल गया, पूछौ वेद पुरान।।

अर्थ :– गुरु बिना माला फेरना पूजा पाठ करना और दान देना सब व्यर्थ चला जाता है चाहे वेद पुराणों में देख लो अर्थात गुरुं से ज्ञान प्राप्त किये बिना कोई भी कार्य करना उचित नहीं है।


साधु दर्शन महाफल, कोटि यज्ञ फल लेह।
इक मन्दिर को का पड़ी, नगर शुद्ध करि लेह।।

अर्थ :- साधु संतों का दर्शन महान फलदायी होता है, इससे करोड़ो यज्ञों के करने से प्राप्त होने वाले पूण्य फलों के बराबर फल प्राप्त होता है। सन्तो का दर्शन, उनके दर्शन के प्रभाव से एक मन्दिर नहीं, बल्कि पूरा नगर पवित्र और शुद्ध हो जाता है। सन्तों के ज्ञान रूपी अमृत से अज्ञानता का अन्धकार नष्ट हो जाता है।


बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार।
दोऊ चुकि खाली पड़े , ताको वार न पार।।

अर्थ :- साधु को वैरागी और संसारी माया से विरक्त होना चाहिए और गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रही प्राणी को उदार चित्त होना चाहिए। यदि ये अपने अपने गुणों से चूक गये तो वे खाली रह जायेगे। उनका उद्धार नहीं होगा।


माला तिलक तो भेष है, राम भक्ति कुछ और।
कहैं कबीर जिन पहिरिया, पाँचो राखै ठौर।।

अर्थ :- माला पहनना और तिलक लगाना तो वेश धारण करना है, इसे वाह्य आडम्बर ही कहेंगे। राम भक्ति तो कुछ और ही है। राम नाम रूपी आन्तरिक माला धारण करता है, वह अपनी पाँचों इन्द्रियों को वश में करके राम माय हो जाता है।


यह तो घर है प्रेम का ऊँचा अधिक इकंत।
शीष काटी पग तर धरै, तब पैठे कोई सन्त।।

अर्थ :- यह प्रेम रूपी घर अधिक ऊँचा और एकांत में बना हुआ है। जो अपना सिर काटकर सद्गुरु के चरणों में अर्पित करने की सामर्थ्य रखता हो वही  इसमें आकर बैठ सकता है अर्थात प्रेम के लिए उत्सर्ग की आवश्यकता होती है।


सबै रसायन हम पिया, प्रेम समान न कोय।
रंचन तन में संचरै, सब तन कंचन होय।।

अर्थ :- मैंने संसार के सभी रसायनों को पीकर देखा किन्तु प्रेम रसायन के समान कोइ नहीं मिला। प्रेम अमृत रसायन के अलौकिक स्वाद के सम्मुख सभी रसायनों का स्वाद फीका है। यह शरीर में थोड़ी मात्रा में भी प्रवेश कर जाये तो सम्पूर्ण शरीर शुद्ध सोने की तरह अद्भुत आभा से चमकने लगता है अर्थात शरीर शुद्ध हो जाता है।


करता था तो क्यों रहा, अब करि क्यों पछताय।
बोया पेड़ बबूल का, आम कहां ते खाय।।

अर्थ :- जब तू बुरे कार्यो को करता था, संतों के समझाने पर भी नहीं समझा तो अब क्यों पछता रहा है। जब तूने काँटों वाले बबूल का पेड़ बोया तो बबूल ही उत्पन्न होंगें आम कहां से खायगा। अर्थात जो प्राणी जैसा करता है, कर्म के अनुसार ही उसे फल मिलता है।


दुनिया के धोखें मुआ, चला कुटुम्ब की कानि।
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा मसानि।।

अर्थ :- सम्पूर्ण संसार स्वार्थी है। स्वार्थ की धोखा धड़ी में ही जीव मरता रहा और संसारी माया के बंधनों में जकड़ा रहा। तुम्हारे कुल की लज्जा तब क्या रहेगी जब तुम्हारे शव को ले जाकर लोग शमशान में रख देंगे।


अहिरन की चोरी करै, करै सुई का दान।
ऊंचा चढ़ा कर देखता, केतिक दूर विमान।।

अर्थ :- अज्ञानता में भटक रहे प्राणियों को सचेत करते हुए कबीरदास जी कहते है – ए अज्ञानियों। अहिरन की चोरी करके सुई का दान करता है । इतना बड़ा अपराध करने के बाद भी तू ऊँचाई पर चढ़कर देखता है कि मेरे लिए स्वर्ग से आता हुआ विमान अभी कितना दूर है। यह अज्ञानता नहीं तो और क्या है?


जिभ्या जिन बस में करी, तिन बस कियो जहान।
नहिं तो औगुन उपजे, कहि सब संत सुजान।।

अर्थ :- जिन्होंने अपनी जिह्वा को वश में कर लिया , समझो सारे संसार को अपने वश में कर लिया क्योंकि जिसकी जिह्वा वश में नहीं है उसके अन्दर अनेकों अवगुण उत्पन्न होते है। ऐसा ज्ञानी जन और संतों का मत है।


काम काम सब कोय कहै, काम न चीन्है कोय।
जेती मन की कल्पना, काम कहावै सोय।।

अर्थ :- काम शब्द का मुख से उच्चारण करना बहुत ही आसान है परन्तु काम की वास्तविकता को लोग नहीं पहचानते। उसके गूढ़ अर्थ को समझने का प्रयास नहीं करते। मन में जितनी भी विषय रूपी कल्पना है वे सभी मिलकर काम ही कहलाती हैं।


कबीर औंधी खोपड़ी , कबहूं धापै नाहिं।
तीन लोक की संपदा कब आवै घर मांहि।।

अर्थ :- मनुष्य की यह उल्टी खोपड़ी कभी धन से तृप्त नहीं होती बल्कि जिसके पास जितना अधिक धन होता है उसकी प्यास उतनी ही बढती जाती है। लोभी व्यक्ति के मन में सदैव यही भावना होती है कि कब तीनों लोको की संपत्ति हमारे घर आयेगी।


साधु ऐसा चाहिए, जाका पूरा मंग।
विपत्ति पडै छाडै नहीं, चढै चौगुना रंग।।

अर्थ :- साधु ऐसा होना चाहिए जिसका मन पूर्ण रूप से संतुष्ट हो। उसके सामने कैसा भी विकट परिस्थिति क्यों न आये किन्तु वह तनिक भी विचलित न हो बल्कि उस पर सत्य संकल्प का रंग और चढ़े अर्थात संकल्प शक्ति घटने के बजाय बढे।


साधु आवत देखि कर, हंसी हमारी देह।
माथा का गहर उतरा, नैनन बढ़ा स्नेह।।

अर्थ :- साधु संतों को आता हुआ देखकर यदि हमारा मन प्रसन्नता से भार जाता है तो समझो हमारे सारे कुलक्षण दूर हो गये। साधु संतों की संगति बहुत बड़े भाग्यशाली को प्राप्त होती है।


कबीर हरिरस बरसिया, गिरि परवत सिखराय।
नीर निवानू ठाहरै, ना वह छापर डाय।।

अर्थ :- सन्त कबीर दस जी कहते है की चाहे वह परवत हो या ऊँचा नीचा धरातल अथवा समतल मैदान, बरसात हर स्थानों पर समान रूप से होती है किन्तु पानी हर स्थान पर नहीं ठहरता, गड्ढे या तालाबों में ही रुक सकता है उसी तरह सद्गुरु का ज्ञान प्रत्येक प्राणी के लिए होता है किन्तु सच्चे जिज्ञासु ही ग्रहण कर सकते है।


बेटा जाये क्या हुआ, कहा बजावै थाल।
आवन जावन होय रहा, ज्यों कीड़ी की नाल।।

अर्थ :- पुत्र के उत्पन्न होने पर लोग खुशियां मानते है ढोल बजवाते हैं । ऐसी ख़ुशी किस लिए। संसार में ऐसा आना जाना लगा ही रहता है जैसे चीटियों की कतार का आना जाना।


सहकामी दीपक दसा, सीखै तेल निवास।
कबीर हीरा सन्त जन, सहजै सदा प्रकाश।।

अर्थ :- विषय भोग में सदा लिप्त रहने वाले मनुष्यों की दशा जलते हुए उस दीपक के समान है जो अपने आधार रूप तेल को भी चूस लेता है जिससे वह जलता है। कबीर दास जी कहते है कि सन्त लोग उस हीरे के समान है जिनका प्रकाश कभी क्षीण नहीं होता। वे अपने ज्ञान के प्रकाश से जिज्ञासु के ह्रदय को प्रकाशित करते है।

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  1. Avatar Ravi
  2. Avatar Sohail
    • Sandeep Kumar Singh Sandeep Kumar Singh

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