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संगति का प्रभाव – अल्बर्ट आइंस्टीन और उसके ड्राईवर की प्रेरक प्रसंग

by Apratim Blog

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संगति का प्रभावदोस्तों, हम आप तक समय-समय पर प्रेरणादायक कहानियां पहुंचाते रहते हैं। इसका मुख्य कारण आपको जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है। हमारी सोच हमारे आस-पास के वातावरण पर निर्भर करती है। हम जिस तरह के लोगों के साथ रहते हैं एक न एक दिन उनके संगति का प्रभाव हमपे हो ही जाता हैं। और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों को अपने रंग में रंग लेते हैं। ऐसी ही एक अल्बर्ट आइन्स्टीन के साथ घटित प्रेरक प्रसंग लेकर आज हम आपके सामने आये हैं।

संगति का प्रभाव

संगति का प्रभाव - अल्बर्ट आइंस्टीन और उसके ड्राईवर की प्रेरक प्रसंग
साभार : Ferdinand Schmutzer (विकिमीडिया पर)

अल्बर्ट आइंस्टीन ( Albert Einstein ), दुनिया का शायद ही ऐसा कोई पढ़ा-लिखा शख्स होगा जो इस नाम को ना जानता हो। उनमें एक ख़ास बात ये थी कि वो जिस काम को करते थे, पूरी लगन से करते थे। और काम को अंजाम तक पहुंचा कर ही सांस लेते थे। यही कारण बना की अल्बर्ट आइंस्टीन दुनिया के महान वैज्ञानिक बने। विज्ञान के क्षेत्र में इन्होंने अपना बहुत बड़ा योगदान दिया है।

सापेक्षता ( Relativity ) नामक भौतिकी ( Physics ) के टॉपिक पर रिसर्च करते हुए अल्बर्ट आइंस्टीन को बड़े-बड़े कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में जाना पड़ता था। वो लेक्चर देते और कोई नई चीज मिलने पर अपने टॉपिक में उसको प्रयोग करते। उनके कार का ड्राइवर भी उनके साथ जहाँ जाता उनका लेक्चर जरूर सुनता। लेक्चर सुनते-सुनते उसे एक-एक शब्द याद हो गया था।

एक दिन अल्बर्ट आइंस्टीन किसी यूनिवर्सटी में लेक्चर देने जा रहे थे। तभी उनके ड्राइवर ने कहा,
“सर आप जो भी लेक्चर देते हैं, वो तो इतना आसान होता है कि सुन कर कोई भी दे सकता है।”

उस दिन आइंस्टीन एक ऐसी यूनिवर्सिटी में जा रहे थे, जहाँ सब उनका नाम तो जानते थे लेकिन उन्होंने कभी आइंस्टीन को देखा नहीं था। इसलिए उन्होंने ड्राइवर से कहा-
“अगर तुम्हें ये सब आसान लगता है तो इस बार मैं कार चलाता हूँ और तुम लेक्चर दो।“

ड्राइवर को बात अच्छी लगी। दोनों ने अपने कपड़े बदले और यूनिवर्सिटी पहुंचे। यूनिवर्सिटी पहुँच कर दोनों कार से बाहर निकले और ड्राइवर ने जाकर लेक्चर देना शुरू किया। उसने बिना पढ़े सारा लेक्चर दे दिया। वहां मौजूद बड़े-बड़े प्रोफेसरों को भी इस बात की भनक न लगी की लेक्चर देने वाले आइंस्टीन नहीं कोई और है। लेक्चर खत्म होने के बाद एक प्रोफेसर ने आकर आइंस्टीन बने ड्राइवर से एक सवाल किया तो उसने जवाब दिया,

“इतने आसान सवाल का जवाब तो मेरा ड्राइवर ही दे देगा।“

फिर सबके सवालों के जवाब ड्राइवर बने हुए आइंस्टीन ने दिए। जब सवालों का सिलसिला ख़त्म हुआ और वापसी का समय आया। तब आइंस्टीन ने बताया की लेक्चर देने वाला उनका ड्राइवर था। ये सच्चाई सुन सब के सिर चकरा गए। जो चीजें बड़े-बड़े साइंटिस्ट समझ नहीं पाते वह एक ड्राइवर ने इतनी आसानी से सबको समझा दिया।

इस तरह हम देख सकते हैं की कैसे एक साधारण ड्राइवर की सोच एक महान वैज्ञानिक के संपर्क में रहने से कितनी महान हो गयी। जिस चीज को करने के लिए लोगों को सारी उम्र लग जाती है। आइंस्टीन के प्रभाव के कारण उसके ड्राइवर ने वो चीज बड़ी आसानी से कर ली। वहीं आइंस्टीन जो की साधारण लोगों में ही रहते थे, अपने गुणों के बल पर अपनी एक अलग पहचान बना ली थी।

सीख (Moral)-

यही गुण हमें भी ग्रहण करने चाहिए। अगर हम अपने विचारों को महान बनाना चाहते हैं तो हमें महान लोगों की संगत में रहने की कोशिश करनी चाहिए। उनके बारे में पढ़ना चाहिए। उनके संगति का प्रभाव हमपे जरुर होगा। उनके नक़्शे कदम पर चल कर हम भी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना सकते हैं।

आपको ये ” संगति का प्रभाव ” कहानी कैसी लगी? ” संगति का प्रभाव ” कहानी के बारे में अपने विचार कमेंट बॉक्स द्वारा हम तक जरूर पहुंचाए। ” संगति का प्रभाव “कहानी को दूसरे लोगों तक भी पहुंचाए जिस से और लोग भी प्रेरित हों।

धन्यवाद।

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References:

Photo source: wikimedia.org

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6 comments

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Dr.vishnu saxena February 3, 2022 - 4:31 PM

आपको ये कहानियां कहाँ मिली, अपने भी तो कहीं न कही पढ़ी होंगी, ये झूठी तो हो नहीं सकती सत्य ही होंगी। फिर इन पर आपका कॉपी राइट कैसे बनता है। कृपया मुझे जानकारी दें जिससे मैं भी अपनी रचनाओं के प्रति सचेत होकर उन्हें सुरक्षित रकह सकूं कृपया मुझे मेल करें

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Prem verma January 22, 2019 - 11:00 AM

Bahot hi prendayak kahani hai thanks

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Sandeep Kumar Singh
Sandeep Kumar Singh January 30, 2019 - 8:37 PM

धन्यवाद प्रेम जी…

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Dilil December 4, 2018 - 10:10 AM

Verry good

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Romi Sharma July 5, 2018 - 11:39 AM

दुसरो के गुणों से सीख लेने के लिए ये एक बहुत ही प्रेरक कहानी है।

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Sandeep Kumar Singh
Sandeep Kumar Singh July 9, 2018 - 11:21 AM

धन्यवाद रोमी शर्मा जी।

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