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नव वर्ष पर कविता – गया पुराना साल सिखाकर | Nav Varsh Par Kavita

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नव वर्ष पर कविता – हर साल सिर्फ तारीख़ नहीं बदलता, वो हमें जीने का एक नया तरीका सिखाकर जाता है। कुछ यादें मुस्कान बन जाती हैं, तो कुछ सबक़ बनकर हमारे साथ चलती हैं। पुराने साल की उन्हीं सीखों और नए साल की उम्मीदों के बीच खड़ी यह कविता हम सबके दिल की बात कहती है…

नव वर्ष पर कविता

नव वर्ष पर कविता

गया पुराना साल सिखाकर
हमको कितनी बातें,
कहा – उजाले दिन के आते
जाती जब हैं रातें।

गए वर्ष भी हर दिन सूरज
निकला था- डूबा था,
कभी बहुत खुश मन होता था
और कभी ऊबा था।

साथ सुखों के गए साल से
दुःख भी हमने पाए,
सोच रहे अब नया साल बस
खुशियाँ लेकर आए।

नहीं कलैंडर – परिवर्तन से
समय बदल है जाता,
काल – चक्र की अविरल गति को
कौन रोक है पाता।

जो कल को था आज उसी से
आगे कथा बढ़ेगी,
पुनः मनुजता नए साल की
सीढ़ी नई चढ़ेगी।

वर्तमान से ही भविष्य का
होता है निर्धारण,
बन पाता है साल तभी जब
मिल जाते हैं क्षण – क्षण।

होता समय कीमती अपना
व्यर्थ इसे ना खोना,
इसमें ही तो सद्कर्मों के
बीज हमें है बोना।

आँखों में आँसू भरकर भी
हमको है मुस्काना,
नए साल में नव सपनों को
फिर से हमें सजाना।

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तो आइए, बीते पलों को सम्मान दें, गलतियों को सीख में बदलें, और आने वाले हर क्षण को अपने कर्मों से सुंदर बनाएं। नया साल सिर्फ कैलेंडर में नहीं, हमारे विचारों और कार्यों में भी नया हो। इन्हीं शुभ भावनाओं के साथ इस कविता को यहीं विराम देते हैं।

धन्यवाद।

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