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कविता नव वर्ष पर – समय कभी रुकता नहीं, हर बीता वर्ष अपने साथ कुछ यादें, कुछ अनुभव और जीवन की सच्चाइयाँ छोड़ जाता है। हार–जीत, मिलन–बिछोह और सपनों की निरंतर यात्रा को समेटे यह कविता हमें बदलाव को स्वीकारना सिखाती है -और नए साल का स्वागत करने का भाव जगाती है।
कविता नव वर्ष पर

कल को जो प्रारम्भ हुआ था
आज वर्ष वह भी बीता,
साथ इसी के हुआ उम्र का
भरा हुआ घट कुछ रीता।
कोई हारा जीवन का रण
जीत गया कोई बाजी,
रूठ समय यह गया किसी से
हुआ किसी से है राजी।
नश्वरता खेला करती है
हर पल ही खेल निराले,
फिर भी मानव बढ़ता आगे
आँखों में सपने पाले।
डाली पर जो फूल खिला है
निश्चित उसका मुरझाना,
ऐसे ही चलता है जग में
लोगों का आना – जाना।
जीवन के इन बदलावों को
हँस – हँसकर हमको सहना,
आते – जाते इन सालों के
साथ हमें भी है चलना।
करें विदाई हम जाते की
आने वाले का स्वागत,
बीते कल से लेकर अनुभव
नवाचार की हो चाहत।
पतझर का हम दर्द भूलकर
नई बहारों में झूमें,
गले लगाएँ हर पड़ाव को
पथ के कंकर को चूमें।
नए साल का सूर्योदय यह
किरण खुशी की बिखराए,
नया उजाला हो सबके मन
कण – कण ज्योतित हो जाए।
महक उठे फिर अपनेपन से
अखिल विश्व का जन – जीवन,
आओ ! आज करें हम सब मिल
नए वर्ष का अभिनन्दन।
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तो आइए, बीते पलों को कृतज्ञता के साथ विदा करें, और आने वाले कल को नई आशाओं, नए उजालों से भर दें। नया वर्ष हम सबके जीवन में सकारात्मकता, अपनापन और खुशियों की नई बहार लेकर आए— इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ
इस ‘ कविता नव वर्ष पर ‘ को यहीं विराम देते हैं।
धन्यवाद।
