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जोकर पर कविता – में सर्कस में काम करने वाले जोकर की स्थिति को दर्शाया गया है। जोकर की मनःस्थिति चाहे कैसी भी हो उसे सर्कस में दिन में कितनी ही बार अपना प्रदर्शन करना पड़ता है। अपनी शारीरिक कमियों को भी उसे जनता को हँसाने का साधन बनाना पड़ता है। जोकरों की आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक स्थिति भी अच्छी नहीं होती फिर भी ये अपने आँसू पीकर दर्शकों को हँसाते हैं। अपने दुःखों को भुलाकर दूसरों को हँसाने वाले जोकर, सच्चे कलाकार होते हैं। हमें इनसे संकट में भी खुश रहने का गुण सीखना चाहिए। हमें जोकरों पर हँसना नहीं चाहिए बल्कि इनके साथ सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। 

जोकर पर कविता

जोकर पर कविता

सर्कस में जब जोकर आता
देख इसे मन खुश हो जाता,
उल्टे-सीधे करके करतब
दर्शक का मन खूब लुभाता।

गोल गोल – सी लाल नाक है
रखा हुआ ज्यों लाल टमाटर,
सिर पर टोपी फुन्दे वाली
रंगीले कपड़ों पर झालर।

कोई जोकर है छोटा – सा
तो कोई जोकर बहुत बड़ा,
कूब पीठ पर दिखे किसी के
तो पेट किसी का बना घड़ा।

अपने देह – विकारों को भी
बना हँसाने का जो साधन,
मन ही मन रोकर भी जोकर
खुश करता है लोगों का मन।

मन में चाहे दर्द भरा हो
घेरे हो तन को बीमारी,
करनी पड़ती पर जोकर को
सदा प्रदर्शन की तैयारी।

बना पात्र खुद को मजाक का
हँसा रहा दुनिया को जोकर,
फिर वह इक दिन खो जाता है
अपना सारा जीवन खोकर।

हम खुश होकर भी जीवन में
दुःख का रोते रहते रोना,
अच्छा हो सीखें जोकर से
आँसू में मुस्कानें बोना।

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