वसंत ऋतु पर कविता | बसंत ऋतु पर छोटी सी कविता | Basant Ritu Par Kavita

वसंत ऋतु पर कविता में पढ़िए चारों ओर हरियाली और बहार के दृश्य का वर्णन। कैसे बसंत में जहाँ एक ओर पेड़-पौधे हरे-भरे होते हैं वहीं कई खेत सरसों के कारन पीले-पीले नज़र आते हैं। उनके पास से गुजरने पर एक भीनी-भीनी खुशबू मन को आनंदित कर देती है। आइये पढ़ते हैं ऐसे ही वातावरण को प्रस्तुत करती वसंत ऋतु पर कविता ( Basant Ritu Par Kavita ):-

वसंत ऋतु पर कविता
Basant Ritu Par Kavita

वसंत ऋतु पर कविता

कोयल  कूक   रही  बागों में,  नाचे    झींगुर  मोर।
ऋतुओं  का  राजा आया  है,  सभी   मचायें  शोर।।
कण  कण में  मस्ती छाई है,  आया  है   मधुमास।
बौराया   लगे   मस्त  महीन, कहते  फागुनी  मास।।

पीले   पीले  पुष्प  खिले  है,   पीली   सरसों  गात।
मदमाते    मकरंद  भरे   से,  दिखता  है  हर  पात।।
तरुणाई   छाई   पुष्पों   पर,  मदमाता    है    भृंग।
हरी   भरी   रंगीन    छटाये,  रंग   भरा   हो   श्रृंग।।

नैना   दिखते   मदमाते   से,   मतवाला   है   प्रीत।
हर  मन  में  उत्साह  भरा  है,  गली  गली  में गीत।।
फागुन  हँसता  झूम  रहा  है,  लगा  रहा  है  आग।
नर  नारी  सब  सुध  बुध  खोये, खेल  रहे हैं फाग।।

मस्त    मगन    पौधे   लहराये,   छेड़   रहे  संबाद।
कोयल  कूक  रही  बागों  में, मिटे  हृदय  अवसाद।।
मधुर मधुर मधुपों का गुंजन,खिला खिला आकाश।
इन्द्रधनुष  सा  नभ  पर छाया, माधव बना प्रकाश।।

वाग्देवी   वाणी  वाचा  माँ,  नमन  करो  स्वीकार।
चरणों  का  मो  दास बनाकर, कर मो पे उपकार।।
मंत्र    तंत्र    माँ  नहीं   जानते, भरदो उर में ज्ञान।
कपट  द्वेष  ईर्ष्या   छोड़े  हम, माँ  तेरा  ही ध्यान।।

पढ़िए :- बसंत ऋतु पर कविता “माँ सरस्वती वंदना”


रचनाकार का परिचय

pandit sanjeevn shukla

यह कविता हमें भेजी है पं. संजीव शुक्ल “सचिन” जी  ने। आपका जन्म गांधीजी के प्रथम आंदोलन की भूमि बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के मुसहरवा ( मंशानगर ग्राम ) में 07 जनवरी 1976 को हुआ था। आपके पिता आदरणीय विनोद शुक्ला जी हैं और माता आदरणीया कुसुमलता देवी जी हैं जिन्होंने स्वत: आपको प्रारंभिक शिक्षा प्रदान किए। आपने अपनी शिक्षा एम.ए.(संस्कृत) तक ग्रहण किया है। आप वर्तमान में अपनी जीविकोपार्जन के लिए दिल्ली में एक प्राईवेट लिमिटेड कंपनी में प्रोडक्शन सुपरवाईजर के पद पर कार्यरत हैं। आप पिछले छ: वर्षों से साहित्य सेवा में तल्लीन हैं और अब तक विभिन्न छंदों के साथ-साथ गीत,ग़ज़ल,मुक्तक,घनाक्षरी जैसी कई विधाओं में अपनी भावनाओं को रचनाओं के रूप में उकेर चुके हैं। अब तक आपकी कई रचनाएं भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपने के साथ-साथ आपकी  “कुसुमलता साहित्य संग्रह” नामक पुस्तक छप चुकी है।

आप हमेशा से ही समाज की कुरूतियों,बुराईयों,भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर कलम चलाते रहे हैं।

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