सही राह दिखा देते हो तुम | जीवन के प्रति शुक्रगुजार महसूस कराती कविता

आप लोगो ने भी ये महसूस किया होगा की जब भी हमारे साथ कोई बुरा या दुःख भरी घटना होती है तो वो आगे चलकर किसी  अच्छे परिणाम का आधार बनती है। कभी-कभी ऐसा भी महसूस होता है की हमारे साथ होने वाली हर एक घटना के पीछे कोई तो है जो हमेशा हमारी भलाई के लिए कार्य करता है और हमें सही राह दिखा रहा है। हमें जानबूझ कर ऐसी घटनाओ से गुजारा जाता है जो हमारे लक्ष्यों को पाने के लिए जरुरी होते है और गैर जरुरी कार्यो को करने से हमें बचाने का प्रयास भी करता है।

वो शक्ति किसका होता या कौन होता है ये तो मैं नही बता सकता लेकिन इतना कह सकता हूँ की हर किसी के लिए वो अलग-अलग होता है। जैसे किसी के लिए वो उनके माँ-बाप का आशीर्वाद हो सकता है, किसी के लिए उनके अपने भगवान् में आस्था, किसी के लिए उनके सच्चे प्रेम का अहसास आदि-आदि। उस शक्ति(या जो भी आप नाम देना चाहे) को मैंने भी कई दफा अपने जीवन में अनुभव किया है। उन्ही अनुभवों को मैं एक कविता के रूप में पिरोके उसका धन्यवाद करने की कोशिश कर रहा हूँ।

सही राह दिखा देते हो तुम

सही राह दिखा देते हो तुम | जीवन के प्रति आभार प्रकट करती कविता

जब भी भटकने लगता हूँ मैं राह,
मुझे सही राह दिखा देते हो तुम।
धूमिल होने लगे मंजिल की चाह,
सीने में इक आग जला देते हो तुम।

आया हूँ मैं इस दुनिया में,
लेकर कुछ बड़े ही काम।
बनना है बेहतर बनाना है बेहतर,
पाना है एक नया आयाम।
ठंडा जो पड़ने लगे मेरा उत्साह,
दुनिया की तस्वीर दिखा देते हो तुम।
जब भी भटकने लगता हूँ मैं राह,
मुझे सही राह दिखा देते हो तुम।

बिछड़े हैं कुछ साथी सफ़र में,
किसी ने है साथ मेरा छोड़ा।
अकेला सा भी पड़ा कई दफ़ा,
लगा किस्मत ने मुहँ मुझसे मोड़ा।
बीती यादें जब सताने लगे बेपनाह,
मुझे भविष्य दिखा देते हो तुम।
जब भी भटकने लगता हूँ मैं राह,
मुझे सही राह दिखा देते हो तुम।

असफलताएं देखी है मैंने बहुत,
और खाई है कई ठोकर भी।
चलते-चलते साथ तेरे मैंने ये जाना,
मिलती है सफलता इनसे होकर ही।
जब भी गिर कर होने लगूं मैं तबाह,
मुझे मंजिल दिखा देते हो तुम।
जब भी भटकने लगता हूँ मैं राह,
मुझे सही राह दिखा देते हो तुम।

कृतज्ञ हूँ मैं तेरे उपकारों का,
मैं तुझको अपना समझता हूँ।
क्योंकि विश्वास है मुझे तुझ पर,
और तुझे हरपल दिल में रखता हूँ।
सुनता हूँ कभी खुद के लिए वाह,
मुझे अपनी याद दिला देते हो तुम।
जब भी भटकने लगता हूँ मैं राह,
मुझे सही राह दिखा देते हो तुम।
और धूमिल होने लगे मंजिल की चाह,
तो सिने में इक आग जला देते हो तुम।

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आपको ये कविता कैसी लगे हमें जरुर बताये। आपके साथ घटी ऐसी प्रेरक घटनाएँ हमारे साथ शेयर करे।

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