Home हिंदी कविता संग्रह Rashmirathi Karna Vadh | रश्मिरथी कर्ण वध | Rashmirathi Poem 7th sarg

Rashmirathi Karna Vadh | रश्मिरथी कर्ण वध | Rashmirathi Poem 7th sarg

by Apratim Blog

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रश्मिरथी कर्ण वध ( 7th sarg Rashmirathi Karna Vadh )  “ रश्मिरथी ” महाभारत के पात्र कर्ण के जीवन और चरित्र पर रचा गया काव्य है। जिसमें उनके जीवन से लेकर मृत्यु तक की सभी घटनाएं सम्मिलित की गयी हैं। कर्ण के द्वारा कवि ने यह सन्देश हम तक पहुँचाने का प्रयास किया है कि मानव जीवन में किसी कुल या वंश में जन्म लेने से ही श्रेष्ठता नहींं आती। व्यक्ति उत्तम बनता है अपने गुणों और व्यव्हार से

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रश्मिरथी के सप्तम सर्ग में कर्ण और अर्जुन के बीच युद्ध का वर्णन है। किस तरह भगवान् कृष्ण के कहने पर अर्जुन कर्ण का वध करते हैं। तो आइये पढ़ते हैं रामधारी दिनकर जी के शब्दों में रश्मिरथी कर्ण वध :-

Rashmirathi Karna Vadh
रश्मिरथी कर्ण वध

Rashmirathi Karna Vadh

निशा बीती, गगन का रूप दमका,
किनारे पर किसी का चीर चमका।
क्षितिज के पास लाली छा रही है,
अतल से कौन ऊपर आ रही है?

सँभाले शीश पर आलोक मण्डल,
दिशाओं में उड़ाती ज्योतिरञ्चल,
किरण में स्निग्ध आतप फेंकती-सी,
शिशिर-कम्पित द्रुमों को सेंकती-सी,

खगों का स्पर्श से कर पङ्गु – मोचन,
कुसुम के पोंछती हिम – सिक्त लोचन,
दिवस की स्वामिनी आयी गगन में,
उड़ा कुंकुम, जगा जीवन भुवन में।

मगर, नर बुद्धि – मद से चूर होकर,
अलग बैठा हुआ है दूर होकर,
उषा पोंछे भला फिर आँख कैसे?
करे उन्मुक्त मन की पाँख कैसे?

मनुज विभाट् ज्ञानी हो चुका है,
कुतुक का उत्स पानी हो चुका है।
प्रकृति में कौन वह उत्साह खोजे?
सितारों के हृदय में राह खोजे?

विभा नर को नहीं भरमायगी यह?
मनस्वी को कहाँ ले जायगी यह?
कभी मिलता नहीं आराम इसको,
न छेड़ो, हैं अनेकों काम इसको।

महाभारत मही पर चल रहा है,
भुवन का भाग्य रण में जल रहा है।
मनुज ललकारता फिरता मनुज को,
मनुज ही मारता फिरता मनुज को।

पुरुष की बुद्धि गौरव खो चुकी है,
सहेली सर्पिणी की हो चुकी है।
न छोड़ेगी किसी अपकर्म को वह,
निगल ही जायगी सद्धर्म को वह।

मरे अभिमन्यु अथवा भीष्म टूटें,
पिता के प्राण सुत के साथ छूटें,
मचे घनघोर हाहाकार जग में,
भरे वैधव्य की चीत्कार जग में,

मगर, पत्थर हुआ मानव-हृदय है,
फ़क़त, वह खोजता अपनी विजय है.
नहीं ऊपर उसे यदि पायगा वह,
पतन के गर्त में भी जायगा वह।

पड़े सबको लिये पाण्डव पतन में,
गिरे जिस रोज द्रोणाचार्य रण में,
बड़े धर्मिष्ठ, भावुक और भोले,
युधिष्ठिर-जीत के हित झूठ बोले।

नहीं थोड़े बहुत का भेद मानो,
बुरे साधन हुए तो सत्य जानो,
गलेंगे बर्फ में मन भी, नयन भी,
अंगूठा ही नहीं, सम्पूर्ण तन भी।

नमन उनको, गये जो स्वर्ग मर कर,
कलङ्कित शत्रु को, निज को अमर कर।
नहीं अवसर अधिक दुख-दैन्य का है,
हुआ राधेय नायक सैन्य का है।

जगा लो वह निराशा छोड़ करके,
द्विधा का जाल झीना तोड़ करके।
गरजता, “ज्योति के आधार! जय हो,
चरम आलोक मेरा भी उदय हो!

“बहुत धुधुआ चुकी, अब आग फूटे,
किरण सारी सिमट कर आज छूटे।
छिपे हों देवता! अङ्गार जो भी,
दबे हों प्राण में हुङ्कार जो भी,

“उन्हें पुञ्जित करो, आकार दो हे!
मुझे मेरा ज्वलित शृङ्गार दो हे!
पवन का वेग दो, दुर्जय अनल दो,
विकतन! आज अपना तेज-बल दो!

“मही का सूर्य होना चाहता हूँ,
विभा का तूर्य होना चाहता हूँ।
समय को चाहता हूँ दास करना,
अभय हो मृत्यु का उपहास करना।

“भुजा की थाह पाना चाहता हूँ,
हिमालय को उठाना चाहता हूँ।
समर के सिन्धु को मथ कर शरों से,
धरा हूँ चाहता श्री को करों से।

“ग्रहों को खींच लाना चाहता हूँ
हथेली पर नचाना चाहता हूँ,
मचलना चाहता हूँ धरा पर मैं,
हँसा हूँ चाहता अङ्गार पर मैं।

“समूचा सिन्धु पीना चाहता हूँ,
धधक कर आज जीना चाहता हूँ,
समय को बन्द करके एक क्षण में,
चमकना चाहता हूँ हो सघन मैं।

“असम्भव कल्पना साकार होगी,
पुरुष की आज जयजयकार होगी!
समर वह आज ही होगा मही पर,
न जैसा था हुआ पहले कहीं पर।

“चरण का भार लो, सिर पर सँभालो,
नियति की दूतियो! मस्तक झुका लो।
चलो, जिस भाँति चलने को कहूँ मैं,
ढलो, जिस भाँति ढलने को कहूँ मैं।

“न कर छल-छत्र से आघात फूलो,
पुरुष हूँ मैं, नहीं यह बात भूलो।
कुचल दूंगा, निशानी मेट दूंगा,
चढ़ा दुर्जय भुजा की भेंट दूंगा।

“अरी, यों भागती कबतक चलोगी?
मुझे ओ वंचिके! कबतक छलोगी?
चुराओगी कहाँ तक दाँव मेरा?
रखोगी रोक कबतक पाँव मेरा?

“अभी भी सत्त्व है उद्दाम तुमसे,
हृदय की भावना निष्काम तुमसे,
चले संघर्ष आठों आठों याम तुमसे,
करूँगा अन्त तक संग्राम तुमसे।

“कहाँ तक शक्ति से वंचित करोगी?
कहाँ तक सिद्धियाँ मेरी हरोगी?
तुम्हारा छद्म सारा शेष होगा,
न सञ्चय कर्ण का निःशेष होगा।

“कवच-कुण्डल गया ; पर, प्राण तो हैं,
भुजा में शक्ति, धनु पर बाण तो हैं।
गयी एकघ्नि तो सब कुछ गया क्या?
बचा मुझमें नहीं कुछ भी नया क्या?

“समर की शूरता साकार हूँ मैं,
महा मार्तण्ड का अवतार हूँ मैं।
विभूषण वेद-भूषित कर्म मेरा,
कवच है आज तक का धर्म मेरा।

“तपस्याओ! उठो, रण में गलो तुम,
नयी एकघ्नियाँ बन कर ढलो तुम।
अरी ओ सिद्धियों की आग! आओ,
प्रलय का तेज बन मुझमें समाओ।

“कहाँ हो पुण्य? बाँहों में भरो तुम,
अरी व्रत – साधने! आकार लो तुम ।
हमारे योग की पावन शिखाओ,
समर में आज मेरे साथ आओ।

“उगी हों ज्योतियाँ यदि दान से भी,
मनुज – निष्ठा, दलित – कल्याण से भी,
चलें वे भी हमारे साथ होकर,
पराक्रम – शौर्य की ज्वाला सँजो कर।

“हृदय से पूजनीया मान करके,
बड़ी ही भक्ति से सम्मान करके,
सुवामा – जाति को सुख दे सका हूँ,
अगर आशीष उनसे ले सका हूँ,

‘समर में तो हमारा वर्म हो वह,
सहायक आज ही सत्कर्म हो वह।
सहारा माँगता हूँ पुण्य – बल का
उजागर धर्म का, निष्ठा अचल का।

‘प्रवंचित हूँ, नियति की दृष्टि में दोषी बड़ा हूँ,
विधाता से किये विद्रोह जीवन में खड़ा हूँ।
स्वयं भगवान् मेरे शत्रु को ले चल रहे हैं,
अनेकों भाँति से गोविन्द मुझको छल रहे हैं।

“मगर, राधेय का स्यन्दन नहीं तब भी रुकेगा,
नहीं गोविन्द को भी युद्ध में मस्तक झुकेगा।
बताऊँगा उन्हें मैं आज, नर धर्म क्या है,
समर कहते किसे हैं और जय का मर्म क्या है।

“बचा कर पाँव धरना, थाहते चलना समर को
बनाना ग्रास अपनी मृत्यु का योद्धा अपर को,
पुकारे शत्रु तो छिप व्यूह में प्रच्छन्न रहना,
सभी के सामने ललकार को मन मार सहना ।

“प्रकट होगा विपद् के बीच में प्रतिवीर हो जब,
धनुष ढीला, शिथिल उसका ज़रा कुछ तीर हो जब ।
कहाँ का धर्म? कैसी भर्त्सना की बात है यह?
नहीं यह वीरता, कौटिल्य का अपघात है यह।

“समझ में कुछ न आता, कृष्ण क्या सिखला रहे हैं,
जगत् को कौन नूतन पुण्य-पथ दिखला रहे हैं।
हुआ वध द्रोण का कल जिस तरह वह धर्म था क्या?
समर्थन-योग्य केशव के लिए वह कर्म था क्या?

‘यही धर्मिष्ठता? नय-नीति का पालन यही है?
मनुज मलपुंज के मालिन्य का क्षालन यही है?
यही कुछ देखकर संसार क्या आगे बढ़ेगा?
जहाँ गोविन्द हैं, उस शृङ्ग के ऊपर चढ़ेगा?

“करें भगवान जो चाहें, उन्हें सब कुछ क्षमा है,
मगर क्या वज्र का विस्फोट छींटों से थमा है?
चलें वे बुद्धि की ही चाल, मैं बल से चलूँगा,
न तो उनको, न होकर जिह्य अपने को छलूँगा।

“डिगाना धर्म क्या इस चार वित्तों की मही को?
भुलाना क्या मरण के बादवाली जिन्दगी को।
बसाना एक पुर क्या लाख जन्मों को जलाकर!
मुकुट गढ़ना भला क्या पुण्य को रण में गला कर?

“नहीं राधेय सत्पथ छोड़ कर अघ-ओक लेगा,
विजय पाये न पाये, रश्मियों का लोक लेगा!
विजय-गुरु कृष्ण हों, गुरु किन्तु, मैं बलिदान का हूँ,
असीसें देह को वे, मैं निरन्तर प्राण का हूँ।

“जगी, बलिदान की पावन शिखाओ,
समर में आज कुछ करतब दिखाओ।
नहीं शर ही, सखा सत्कर्म भी हो,
धनुष पर आज मेरा धर्म भी हो।

“मचे भूडोल प्राणों के महल में,
समर डूबे हमारे बाहु-बल में।
गगन से वज्र की बौछार छूटे,
किरण के तार से झङ्कार फूटे।

“चलें अचलेश, पारावार डोले,
मरण अपनी पुरी का द्वार खोले।
समर में ध्वंस फटने जा रहा है,
महीमण्डल उलटने जा रहा है।

अनुठा कर्ण का रण आज होगा,
जगत् को काल-दर्शन आज होगा।
प्रलय का भीम नर्तन आज होगा,
वियद्व्यापी विवर्तन आज होगा।

“विशिख जब छोड़ कर तरकस चलेगा,
नहीं गोविन्द का भी बस चलेगा।
गिरेगा पार्थ का सिर छिन्न धड़ से,
जयी कुरुराज लौटेगा समर से।

“बड़ा आनन्द उर में छा रहा है,
लहू में ज्वार उठता जा रहा है।
हुआ रोमाञ्च यह सारे बदन में,
उगे हैं या कटीले वृक्ष तन में।

“अहा! भावस्थ होता जा रहा हूँ,
जगा हूँ या कि सोता जा रहा हूँ?
बजाओ, युद्ध के बाजे बजाओ,
सजाओ, शल्य! मेरा रथ सजाओ।”

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रथ सजा, भेरियाँ घमक उठीं,
गहगहा उठा अम्बर विशाल,
कूदा स्यन्दन पर गरज कर्ण
क्यों उठे गरज क्रोधान्ध काल ।

बज उठे रोर कर पटह-कम्बु,
उल्लसित वीर कर उठे हूह,
उच्छल सागर-सा चला कर्ण
को लिए क्षुब्ध सैनिक समूह।

हेषा रथाश्व की, चक्र-रोर,
दन्तावल का वृंहित अपार,
टंकार धनुर्गुण की भीषण,
दुर्मद रणशूरों की पुकार।

खलमला उठा ऊपर खगोल,
कलमला उठा पृथ्वी का तन,
सन-सन कर उड़ने लगे विशिख,
झनझना उठीं असियाँ झनझन।

तालोच्च – तरङ्गावृत बुभुक्षु – सा
लहर उठा सङ्गर समुद्र,
या पहन ध्वंस की लपट लगा
नाचने समर में स्वयं रुद्र

हैं कहाँ इन्द्र ? देखें, कितना
प्रज्वलित मर्त्य जन होता है
सुरपति से छले हुए नर का
कैसा प्रचण्ड रण होता है

अङ्गार-वृष्टि पा धधक उठे
जिस तरह शुष्क कानन का तृण,
सकता न रोक शस्त्री की गति
पुजित जैसे नवनीत मसृण,

यम के समक्ष जिस तरह नहीं
चल पाता बद्ध मनुज का वश,
हो गयी पाण्डवों की सेना त्योंही
बाणों से विद्ध, विवश।

भागने लगे नरवीर छोड़ वह
दिशा जिधर भी झुका कर्ण;
भागे जिस तरह लवा का दल
सामने देख रोषण सुपर्ण।

‘रण में क्यों आये आज?’ लोग
मन-ही-मन में पछताते थे,
दूर से देख कर भी उसको,
भय से सहमे सब जाते थे।

काटता हुआ रण-विपिन क्षुब्ध,
राधेय गरजता था क्षण-क्षण।
सुन-सुन निनाद की धमक शत्रु का,
व्यूह लरज़ता था क्षण-क्षण ।

अरि की सेना को विकल देख,
बढ़ चला और कुछ समुत्साह;
कुछ और समुद्वेलित होकर,
उमड़ा भुज का सागर अथाह ।

गरजा अशङ्क हो कर्ण, “शल्य!
देखो कि आज क्या करता हूँ,
कौन्तेय-कृष्ण, दोनों को ही,
जीवित किस तरह पकड़ता हूँ।

बस, आज शाम तक यहीं सुयोधन
का जय-तिलक सजा करके,
लौटेंगे हम, दुन्दुभि अवश्य
जय की, रण-बीच बजा करके।

इतने में, कुटिल नियति – प्रेरित
पड़ गये सामने धर्मराज,
टूटा कृतान्त-सा कर्ण, कोक
पर पड़े टूट जिस तरह बाज़ ।

लेकिन, दोनों का विषम युद्ध,
क्षण भर भी नहीं ठहर पाया,
सह सकी न गहरी चोट, युधिष्ठिर
की मुनि-कल्प, मृदुल काया।

भागे वे रण को छोड़, कर्ण ने
झपट दौड़कर गहा ग्रीव,
कौतुक से बोला, “महाराज!
तुम तो निकले कोमल अतीव ।

हाँ, भीरु नहीं, कोमल कहकर
ही, जान बचाये देता हूँ।
आगे की खातिर एक युक्ति
भी सरल बताये देता हूँ।

“हैं विप्र आप, सेविये धर्म,
तरु-तले कहीं, निर्जन वन में,
क्या काम साधुओं का, कहिये,
इस महाघोर, घातक रण में?

मत कभी क्षात्रता के धोखे,
रण का प्रदाह झेला करिये,
जाइये, नहीं फिर कभी गरुड़
की झपटों से खेला करिये।”

भागे विपन्न हो समर छोड़
ग्लानि में निमज्जित धर्मराज,
सोचते, ‘कहेगा क्या मन में
जानें, यह शूरों का समाज?

प्राण ही हरण करके रहने
क्यों नहीं हमारा मान दिया?
आमरण ग्लानि सहने को ही
पापी न जीवन – दान दिया।”

समझे न हाय, कौन्तेय! कर्ण ने
छोड़ दिये किसलिए प्राण,
गरदन पर आकर लौट गयी
सहसा, क्यों विजयी की कृपाण?

लेकिन, अदृश्य ने लिखा,
कर्ण ने वचन धर्म का पाल दिया,
खड्ग का छीन कर ग्रास, उसे
माँ के अञ्चल में डाल दिया।

कितना पवित्र यह शील! कर्ण
जब तक भी रहा खड़ा रण में,
चेतनामयी माँ की प्रतिमा
घूमती रही तब तक मन में।

सहदेव, युधिष्ठिर, नकुल,
भीम को बार-बार बस में लाकर,
कर दिया मुक्त हँस कर उसने
भीतर से कुछ इङ्गित पाकर।

देखता रहा सब शल्य, किन्तु,
जब इसी तरह भागे पवितन,
बस होकर वह चकित, कर्ण की
ओर देख, यह परुष वचन,

“रे सूतपुत्र! किसलिए विकट
यह कालपृष्ठ धनु धरता है?
मारना नहीं है तो फिर क्यों,
वीरों को घेर पकड़ता है?

“संग्राम विजय तू इसी तरह
सन्ध्या तक आज करेगा क्या?
मारेगा अरियों को कि उन्हें
दे जीवन स्वयं मरेगा क्या?

रण का विचित्र यह खेल,
मुझे तो समझ नहीं कुछ पड़ता है,
कायर! अवश्य कर याद पार्थ की,
तू मन ही मन डरता है।”

हँसकर बोला राधेय, “शल्य!
पार्थ की भीति उसको होगी,
क्षयमान्, क्षणिक, भंगुर शरीर
पर मृषा प्रीति जिसको होगी।

इस चार दिनों के जीवन को,
मैं तो कुछ नहीं समझता हूँ,
करता हूँ वही, सदा जिसको
भीतर से सही समझता हूँ।

“पर, ग्रास छीन अतिशय बुभुक्षु,
अपने इन बाणों के मुख से,
होकर प्रसन्न हँस देता हूँ,
चञ्चल किस अन्तर के सुख से;

यह कथा नहीं अन्तःपुर की,
बाहर मुख से कहने की है,
यह व्यथा धर्म के वर-समान,
सुख-सहित, मौन सहने की है।

“सब आँख मूंद कर लड़ते हैं,
जय इसी लोक में पाने को,
पर, कर्ण जूझता है कोई,
ऊँचा सद्धर्म निभाने को।

सबके समेत पङ्किल सर में,
मेरे भी चरण पड़ेंगे क्या?
ये लोभ मृत्तिकामय जग के,
आत्मा का तेज हरेंगे क्या?

“यह देह टूटनेवाली है, इस
मिट्टी का कब तक प्रमाण?
मृत्तिका छोड़ ऊपर नभ में
भी तो ले जाना है विमान।

कुछ जुटा रहा सामान खमण्डल
में सोपान बनाने को,
ये चार फूल फेंके मैंने,
ऊपर की राह सजाने को।

“ये चार फूल हैं मोल किन्हीं
कातर नयनों के पानी के.
ये चार फूल प्रच्छन्न दान हैं
किसी महाबल दानी के।

ये चार फूल, मेरा अदृष्ट था
हुआ कभी जिनका कामी,
ये चार फूल पाकर प्रसन्न
हँसते होंगे अन्तर्यामी।

“समझोगे नहीं शल्य इसको,
यह करतब नादानों का है,
यह खेल जीत से बड़े किसी,
मक़सद के दीवानों का है।

जानते स्वाद इसका वे ही,
जो सुरा स्वप्न की पीते हैं,
दुनिया में रहकर भी दुनिया
से अलग खड़े जो जीते हैं।”

समझा न, सत्य ही, शल्य इसे,
बोला-“प्रलाप यह बन्द करो,
हिम्मत हो तो लो करो समर,
बल हो, तो अपना धनुष धरो।

लो, वह देखो, वानरी ध्वजा
दूर से दिखायी पड़ती है,
पार्थ के महारथ की घर्घर
आवाज सुनायी पड़ती है।

“क्या वेगवान हैं अश्व!
देख विद्युत् शरमायी जाती है,
आगे सेना छंट रही, घटा
पीछे से छायी जाती है।

राधेय! काल यह पहुँच गया,
शायक सन्धानित तूर्ण करो
थे विकल सदा जिसके हित,
वह लालसा समर की पूर्ण करो।”

पार्थ को देख उच्छल-उमङ्ग
पूरित उर – पारावार हुआ,
दम्भोलि-नाद कर कर्ण कुपित
अन्तक – सा भीमाकार हुआ।

बोला, “विधि ने जिस हेतु पार्थ!
हम दोनों का निर्माण किया,
जिस लिए प्रकृति के अनल-तत्त्व
का हम दोनों ने पान किया।

“जिस दिन के लिए किये आये,
हम दोनों वीर अथक साधन,
आ गया भाग्य से आज जन्म
जन्मों का निर्धारित वह क्षण।

आओ, हम दोनों विशिख-वह्रि
पूजित हो जयजयकार करें,
मर्मच्छेदन से एक दूसरे का
जी भर सत्कार करें।

“पर, सावधान, इस मिलन-बिन्दु से
अलग नहीं होना होगा,
हम दोनों में से किसी एक को
आज यहीं सोना होगा।

हो गया बड़ा अतिकाल,
आज निर्णय हमें कर लेना है,
शत्रु का या कि अपना मस्तक,
काट कर यहीं धर देना है।”

कर्ण का देख यह दर्प पार्थ का,
दहक उठा रविकान्त-हृदय,
बोला, “रे सारथि-पुत्र! किया
तूने, सत्य ही योग्य निश्चय ।

पर कौन रहेगा यहाँ? बात
यह अभी बताये देता हूँ,
धड़ पर से तेरा सीस मूढ़ !
ले, अभी हटाये देता हूँ।”

यह कह अर्जुन ने तान कान तक,
धनुष बाण सन्धान किया,
अपने जानते विपक्षी को,
हत ही उसने अनुमान किया।

पर, कर्ण झेल वह महा विशिख,
कर उठा काल-सा अट्टहास,
रण के सारे स्वर डूब गये,
छा गया निनद से दिशाकाश।

बोला, “शाबाश, वीर अर्जुन !
यह खूब गहन सत्कार रहा;
पर, बुरा न मानो, अगर आन
कर मुझ पर वह बेकार रहा।

मत कवच और कुण्डल विहीन,
इस तन को मृदुल कमल समझो,
साधना-दीप्त वक्षस्थल की,
अब भी दुर्भेद्य अचल समझो।

“अब लो मेरा उपहार, यही
यमलोक तुम्हें पहुँचायेगा,
जीवन का सारा स्वाद तुम्हें
बस, इसी बार मिल जायेगा।”

कह इस प्रकार राधेय
अधर को दबा, रौद्रता में भरके,
हुङ्कार उठा घातिका शक्ति
विकराल शरासन पर धरके।

सँभलें जब तक भगवान्, नचायें
इधर-उधर किञ्चित् स्यन्दन,
तब तक रथ में ही, विकल, विद्ध,
मुर्च्छित हो गिरा पृथानन्दन।

कर्ण का देख यह समर – शौर्य
सङ्गर में में हाहाकार हुआ,
सब लगे पूछने, “अरे
पार्थ का क्या सचमुच संहार हुआ?”

पर नहीं, मरण का तट छूकर,
हो उठा अचिर अर्जुन- प्रबुद्ध
क्रोधान्ध गरज कर लगा कर्ण
के साथ मचाने द्विरथ-युद्ध।

प्रावृट्-से गरज-गरज दोनों,
करते थे प्रतिभट पर प्रहार,
थी तुला-मध्य सन्तुलित खड़ी,
लेकिन, दोनों की जीत हार ।

इस ओर कर्ण मार्तण्ड – सदृश,
उस ओर पार्थ अन्तक-समान,
रण के मिस, मानो, स्वयं प्रलय,
हो उठा समर में मूर्त्तिमान।

जूझना एक क्षण छोड़, स्वतः,
सारी सेना विस्मय – विमुग्ध,
अपलक होकर देखने लगी
दो शितिकण्ठों का विकट युद्ध ।

है कथा, नयन का लोभ नहीं,
संवृत कर सके स्वयं सुरगण,
भर गया विमानों से तिल-तिल,
कुरुभू पर कलकल-नदित गगन।

थी रुकी दिशा की साँस, प्रकृति
के निखिल रूप तन्मय-गभीर,
ऊपर स्तम्भित दिनमणि का रथ,
नीचे नदियों का अचल नीर।

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आह! यह युग्म दो अद्भुत नरों का,
महा मदमत्त मानव कुञ्जरों का;
नृगुण के मर्तिमय अवतार ये दो,
मनुक-कुल के सुभग शृङ्गार ये दो।

परस्पर हो कहीं यदि एक पाते,
ग्रहण कर शील की यदि टेक पाते,
मनुजता को न क्या उत्थान मिलता?
अनूठा क्या नहीं वरदान मिलता?

मनुज की जाति का, पर, शाप है यह,
अभी बाक़ी हमारा पाप है यह,
बड़े जो भी कुसुम कुछ फूलते हैं,
अहंकृति में भ्रमित हो भूलते हैं।

नहीं हिलमिल विपिन को प्यार करते,
झगड़ कर विश्व का संहार करते।
जगत् को डालकर निःशेष दुख में,
शरण पाते स्वयं भी काल-मुख में।

चलेगी यह जगह की क्रान्ति कबतक?
रहेगी शक्ति-वञ्चित शान्ति कबतक?
मनुज मनुजत्व से कबतक लड़ेगा?
अनल वीरत्व से कबतक झड़ेगा?

विकृति जो प्राण में अङ्गार भरती,
हमें रण के लिए लाचार करती,
घटेगी तीव्र उसकी दाह कब तक?
मिलेगी अन्य उसको राह कब तक?

हलाहल का शमन हम खोजते हैं,
मगर, शायद, विमन हम खोजते हैं।
बुझाते हैं दिवस में जो जहर हम,
जगाते फूंक उसको रात भर हम।

क्रिया कुञ्चित, विवेचन व्यस्त नर का,
हृदय शत भीति से सन्त्रस्त नर का।
महाभारत मही पर चल रहा है,
भुवन का भाग्य रण में जल रहा है।

चल रहा महाभारत का रण,
जल रहा धरित्री का सुहाग,
फट कुरुक्षेत्र में खेल रही
नर के भीतर की कुटिल आग।

बाजियों – गजों की लोथों में
गिर रहे मनुज के छिन्न अङ्ग,
बह रहा चतुष्पद और द्विपद
का रुधिर मिश्र हो एक सङ्ग।

गत्वर, गैरेय, सुधर भूधर-से
लिये रक्त -रञ्जित शरीर,
थे जूझ रहे कौन्तेय – कर्ण
क्षण-क्षण करते गर्जन गभीर ।

दोनों रणकुशल धनुर्धर नर,
दोनों समबल, दोनों समर्थ,
दोनों पर दोनों की अमोघ
थी विशिख-वृष्टि हो रही व्यर्थ ।।

इतने में शर के लिए कर्ण ने
देखा जो अपना निषङ्ग,
तरकस में फुङ्कार उठा,
कोई प्रचण्ड विषधर भुजङ्ग,

कहता कि “कर्ण! मैं अश्वसेन
विश्रुत भुजगों का स्वामी हूँ,
जन्म से पार्थ का शत्रु परम,
तेरा बहुविधि हितकामी हूँ

“बस, एक बार कर कृपा धनुष पर
चढ़ शरव्य तक जाने दे,
इस महाशत्रु को अभी तुरत
स्यन्दन में मुझे सुलाने दे।

कर वमन गरल जीवन भर का
सञ्चित प्रतिशोध उतारूँगा,
तु मुझे सहारा दे, बढ़कर
मैं अभी पार्थ को मारूँगा।”

राधेय जो हँसकर बोला,
“रे कुटिल ! बात क्या कहता है?
जय का समस्त साधन नर की
अपनी बाँहों में रहता है।

उस पर भी साँपों से मिलकर
मैं मनुज, मनुज से युद्ध करूँ?
जीवन भर जो निष्ठा पाली,
उससे आचरण विरुद्ध करूँ?

तेरी सहायता से जय तो मैं
अनायास पा जाऊँगा
आनेवाली मानवता को
लेकिन, क्या मुख दिखलाऊँगा?

संसार कहेगा, जीवन का
सब सुकृत कर्ण न क्षार किया;
प्रतिभट के वध के लिए सर्प का
पापी न साहाय्य लिया।

“रे अश्वसेन! तेरे अनेक
वंशज हैं छिपे नरों में भी,
सीमित वन में ही नहीं, बहुत
बसते पुर – ग्राम – घरों में भी।

ये नर-भुजङ्ग मानवता का
पथ कठिन बहुत कर देते हैं,
प्रतिबल के वध के लिए नीच
साहाय्य सर्प का लेते हैं।

“ऐसा न हो कि इन साँपों में
मेरा भी उज्ज्वल नाम चढ़े।
पाकर मेरा आदर्श और
कुछ नरता का यह पाप बढ़े।

अर्जुन है मेरा शत्रु, किन्तु,
सर्प नहीं, नर ही तो है,
संघर्ष सनातन नहीं, शत्रुता
इस जीवन भर ही तो है।

“अगला जीवन किसलिए भला,
तब हो द्वेषान्ध बिगाडूँ मैं?
साँपों की की जाकर शरण
सर्प बन क्यों मनुष्य को मारूँ मैं?

जा भाग, मनुज का सहज शत्रु,
मित्रता न मेरी पा सकता,
मैं किसी हेतु भी यह कलङ्क,
अपने पर नहीं लगा सकता।”

काकोदर को कर विदा कर्ण
फिर बढ़ा समर में गर्जमान,
अम्बर अनन्त झङ्कार उठा,
हिल उठे निर्जरों के विमान।

तूफ़ान उठाये चला कर्ण
बल से धकेल अरि के दल को,
जैसे प्लावन की धार बहाये
चले सामने के जल को।

पाण्डव-सेना भयभीत भागती
हुई जिधर भी जाती थी।
अपने पीछे दौड़ते हुए
वह आज कर्ण को पाती थी।

रह गयी किसी के भी मन में
जय की किञ्चित भी नहीं आस,
आखिर, बोले भगवान् सभी को
देख व्यग्र, व्याकुल, हताश।

“अर्जुन! देखो, किस तरह कर्ण
सारी सेना पर टूट रहा,
किस तरह पाण्डवों का पौरुष
होकर अशङ्क वह लूट रहा।

देखो जिस तरफ़, उधर उसके
ही बाण दिखायी पड़ते हैं,
बस, जिधर सुनो, केवल उसके ।
हुंकार सुनायी पड़ते हैं

“कैसी करालता! क्या लाघव!
कितना पौरुष! कैसे प्रहार!
किस गौरव से वह वीर द्विरद
कर रहा समर-वन में विहार!

व्यूहों पर व्यूह फटे जाते,
संग्राम उजड़ता जाता है
ऐसी तो नहीं कमल वन में
भी कुञ्जर धूम मचाता है।

“इस पुरुष-सिंह का समर देख
मेरे तो हुए निहाल नयन,
कुछ बुरा न मानो, कहता हूँ,
मैं आज एक चिर-गूढ़ वचन।

कर्ण के साथ तेरा बल भी
मैं खूब जानता आया हूँ,
मन-ही-मन तुझ से बड़ा वीर,
पर इसे मानता आया हूँ।

‘औ’ देख चरम वीरता आज तो
यही सोचता हूँ मन में,
है भी कोई, जो जीत सके
इस अतुल धनुर्धर को रण में?

मैं चक्र सुदर्शन धरूँ और
गाण्डीव अगर तू तानेगा,
तब भी, शायद ही, आज कर्ण
आतङ्क हमारा मानेगा।

“यह नहीं देह का बल केवल,
अन्तर्नभ के भी विवस्वान्,
हैं किये हुए मिलकर इसको
इतना प्रचण्ड जाज्वल्यमान।

सामान्य पुरुष यह नहीं, वीर
यह तपोनिष्ठ व्रतधारी है।
मृत्तिका-पुञ्ज यह मनुज
ज्योतियों के जग का अधिकारी है।

‘कर रहा काल – सा घोर समर,
जय का अनन्त विश्वास लिये,
है घूम रहा निर्भय, जाने,
भीतर क्या दिव्य प्रकाश लिये!

जब भी देखो, तब आँख गड़ी
सामने किसी अरिजन पर है,
भूल ही गया है, एक शीश
इसके अपने भी तन पर है।

‘अर्जुन! तुम भी अपने समस्त
विक्रम – बल का आह्वान करो,
अर्जित असंख्य विद्याओं का
हो सजग हृदय में ध्यान करो।

जो भी हो तुममें तेज, चरम पर
उसे खींच लाना होगा,
तैयार रहो, कुछ चमत्कार
तुमको भी दिखलाना होगा।”

दिनमणि पश्चिम की ओर ढले
देखते हुए संग्राम घोर,
गरजा सहसा राधेय, न जाने,
किस प्रचण्ड सुख में विभोर।

“सामने प्रकट हो प्रलय! फाड़
तुझको मैं राह बनाऊँगा,
जाना है तो तेरे भीतर
संहार मचाता जाऊँगा।

“क्या धमकाता है काल? अरे,
आ जा, मुट्ठी में बन्द करूँ,
छुट्टी पाऊँ, तुझको समाप्त
कर दूँ, निज को स्वच्छन्द करूँ।

ओ शल्य! हयों को तेज करो,
ले चलो उड़ाकर शीघ्र वहाँ,
गोविन्द-पार्थ के साथ डटे हों
चुनकर सारे वीर जहाँ।

“हो शस्त्रों का झन-झन निनाद,
दन्तावल हों चिंग्घार रहे,
रण को कराल घोषित करके
हों समरशूर हुङ्कार रहे।

कटते हों अगणित रुण्ड-मुण्ड,
उठता हो आर्तनाद क्षण-क्षण,
झनझना रही हों तलवारें;
उड़ते हों तिग्म विशिख सन-सन।

‘संहार देह धर खड़ा जहाँ
अपनी पैंजनी बजाता हो,
भीषण गर्जन में जहाँ रोर
ताण्डव का डूबा जाता हो।

ले चलो, जहाँ फट रहा व्योम,
मच रहा जहाँ पर घमासान,
साकार ध्वंस के बीच पैठ
छोड़ना मुझे है आज प्राण।’

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समझ में शल्य की कुछ भी न आया,
हयों को जोर से उसने भगाया।
निकट भगवान् के रथ आन पहुँचा,
अगम, अज्ञात का पथ आन पहुँचा?

अगम की राह, पर, सचमुच अगम है,
अनोखा ही नियति का कार्यक्रम है।
न जानें, न्याय भी पहचानती है,
कुटिलता ही कि केवल जानती है?

रहा दीपित सदा शुभ धर्म जिसका,
चमकता सूर्य-सा था कर्म जिसका,
अबाधित दान का आधार था जो,
धरित्री का अतुल शृङ्गार था जो,

क्षुधा जागी उसी की हाय, भू को,
कहें क्या मेदिनी मानव-प्रसू को?
रुधिर के पङ्क में रथ को जकड़ कर,
गयी वह बैठ चक्के को पकड़ कर ।

लगाया ज़ोर अश्वों ने न थोड़ा,
नहीं लेकिन, मही ने चक्र छोड़ा।
वृथा साधन हुए जब सारथी के,
कहा लाचार हो उसने रथी से।

“बड़ी राधेय! अद्भुत बात है यह,
किसी दुःशक्ति का ही घात है यह।
जरा-सी कीच में स्यन्दन फँसा है,
मगर, रथ-चक्र कुछ ऐसा फँसा है;

“निकाले से निकलता ही नहीं है,
हमारा जोर चलता ही नहीं है।
जरा तुम भी इसे झकझोर देखो,
लगा अपनी भुजा का जोर देखो।’

हँसा राधेय कर कुछ याद मन में,
कहा, “हाँ, सत्य ही, सारे भुवन में।
विलक्षण बात मेरे ही लिए है,
नियति का घात मेरे ही लिए है।

“मगर है ठीक, किस्मत ही फँसे जब,
धरा ही कर्ण का स्यन्दन ग्रसे जब,
सिवा राधेय के पौरुष प्रबल से,
निकाले कौन उसको बाहुबल से?”

उछल कर कर्ण स्यन्दन से उतर कर,
फँसे रथ-चक्र को भुज-बीच भर कर,
लगा ऊपर उठाने ज़ोर करके,
कभी सीधा, कभी झकझोर करके।

मही डोली, सलिल-आगार डोला,
भुजा के ज़ोर से संसार डोला।
न डोला, किन्तु, जो चक्का फँसा था,
चला वह जा रहा नीचे धंसा था।

विपद् में कर्ण को यों ग्रस्त पाकर,
शरासनहीन, अस्त-व्यस्त पाकर,
जगा कर पार्थ को भगवान् बोले
“खड़ा है देखता क्या मौन, भोले?

“शरासन तान, बस, अवसर यही है,
घड़ी फिर और मिलने को नहीं है।
विशिख कोई गले के पार कर दे,
अभी ही शत्रु का संहार कर दे।”

श्रवण कर विश्वगुरु की देशना यह,
विजय के हेतु आतुर एषणा यह,
सहम उट्ठा जरा कुछ पार्थ का मन,
विनय में ही मगर, बोला अकिञ्चन।

“नरोचित, किन्तु, क्या यह कर्म होगा?
मलिन इससे नहीं क्या धर्म होगा?” ।
हँसे केशव, “वृथा हठ ठानता है।
अभी तू धर्म को क्या जानता है?

“कहूँ जो, पाल उसको, धर्म है यह।
हनन कर शत्रु का, सत्कर्म है यह।
क्रिया को छोड़ चिन्तन में फँसेगा,
उलट कर काल तुझको ही ग्रसेगा।”

भला क्यों पार्थ कालाहार होता?
वृथा क्यों चिन्तना का भार ढोता?
सभी दायित्व हरि पर डाल करके,
मिली जो शिष्टि उसको पाल करके,

लगा राधेय को शर मारने वह,
विपद् में शत्रु को संहारने वह,
शरों से बेधने तन को, बदन को,
दिखाने वीरता निःशस्त्र जग को।

विशिख-सन्धान में अर्जुन निरत था,
खड़ा राधेय निःसम्बल, विरथ था,
खड़े निर्वाक सब जन देखते थे,
अनोखे धर्म का रण देखते थे।

नहीं जब पार्थ को देखा सुधरते,
हृदय में धर्म का टूक ध्यान धरते।
समय के योग्य धीरज को सँजोकर,
कहा राधेय न गम्भीर होकर।

“नरोचित धर्म से कुछ काम तो लो।
बहुत खेले, जरा विश्राम तो लो।
फँसे रथचक्र को जब तक निकालूँ,
धनुष धारण करूँ, प्रहरण सँभालूँ,

“रुको तब तक, चलाना बाण फिर तुम,
हरण करना, सको तो, प्राण फिर तुम।
नहीं अर्जुन! शरण मैं माँगता हूँ,
समर्थित धर्म से रण माँगता हूँ

“कलङ्कित नाम मत अपना करो तुम।
हृदय में ध्यान इसका भी धरो तुम,
विजय तन की घड़ी भर की दमक है।
इसी संसार तक उसकी चमक है।

“भुवन की जीत मिटती है भुवन में,
उसे क्या खोजना गिर कर पतन में?
शरण केवल उजागर धर्म होगा,
सहारा अन्त में सत्कर्म होगा।”

उपस्थित देख यों न्यायार्थ अरि को,
निहारा पार्थ ने हो खिन हरि को।
मगर, भगवान् किञ्चित् भी न डोले,
कुपित हो वज्र-सी यह बात बोले ।

“प्रलापी! ओ उजागर धर्म वाले!
बड़ी निष्ठा, बड़े बड़े सत्कर्म वाले!
मरा, अन्याय से अभिमन्यु जिस दिन,
कहाँ पर सो रहा था धर्म उस दिन?

“हलाहल भीम को जिस दिन पड़ा था,
कहाँ पर धर्म यह उस दिन धरा था?
लगी थी आग जब लाक्षा-भवन में,
हँसा था धर्म ही तब क्या भुवन में?

“सभा में द्रौपदी को खींच लाके,
सुयोधन की उसे दासी बताके,
सुवामा-जाति को आदर दिया जो,
बहुत सत्कार तुम सबने किया जो,

“नहीं वह और कुछ, सत्कर्म ही था,
उजागर, शीलभूषित धर्म ही धर्म ही था।
जुए में हारकर धन-धाम जिस दिन,
हुए पाण्डव यती निष्काम जिस दिन,

“चले वनवास को तब धर्म था वह,
शकुनियों का नहीं अपकर्म था वह ।
अवधि कर पूर्ण जब, लेकिन, फिरे वे,
असल में, धर्म से ही थे गिरे वे।

“बड़े पापी हुए जो ताज माँगा,
किया अन्याय; अपना राज माँगा।
नहीं धर्मार्थ वे क्यों हारते हैं?
अघी हैं, शत्रु को क्यों मारते हैं?

“हमीं धर्मार्थ क्या दहते रहेंगे?
सभी कुछ मौन हो सहते रहेंगे?
कि देंगे धर्म को बल अन्य जन भी?
तजेंगे क्रुरता-छल अन्य जन भी?

“न दी क्या यातना इन कौरवों ने?
किया क्या-क्या न निर्घिन कौरवों ने?
मगर, तेरे लिए सब धर्म ही था,
दुरित निज मित्र का, सत्कर्म ही था।

“किये का जब उपस्थित फल हुआ है,
ग्रसित अभिशाप से सम्बल हुआ है,
चला है खोजने तू धर्म रण में,
मृषा किल्विष बताने अन्य जन में।

“शिथिल कर पार्थ! किञ्चित् भी न मन तू।
न धर्माधर्म में पड़ भीरु बन तू।
कड़ा कर वक्ष को, शर मार इसको,
चढ़ा शायक, तुरत संहार इसको।”

हँसा राधेय, “हाँ, अब देर भी क्या?
सुशोभन कर्म में अवसेर भी क्या?
कृपा कुछ और दिखलाते नहीं क्यों?
सुदर्शन ही उठाते हैं नहीं क्यों?

“थके बहुविधि स्वयं ललकार करके,
गया थक पार्थ भी शर मार करके,
मगर, यह वक्ष फटता ही नहीं है,
प्रकाशित शीश कटता ही नहीं है।

“शरों से मृत्यु झड़ कर छा रही है,
चतुर्दिक् घेर कर मँडला रही है,
नहीं, पर लीलती वह पास आकर,
रुकी है भीति से अथवा लजाकर ।

“ज़रा तो पूछिये, वह क्यों डरी है?
शिखा दुर्द्धर्ष क्या मुझमें भरी है?
मलिन वह हो रही किसकी दमक से?
लजाती किस तपस्या की चमक से?

“ज़रा बढ़ पीठ पर निज पाणि धरिये,
सहमती मृत्यु को निर्भीक करिये।
न अपने आप मुझको खायगी वह,
सिकुड़ कर भीति से मर जायगी वह।

“कहा जो आपने, सब कुछ सही है,
मगर अपनी मुझे चिन्ता नहीं है।
सुयोधन-हेतु ही पछता रहा हूँ,
बिना विजयी बनाये जा रहा हूँ।

“वृथा है पूछना किसने किया क्या,
जगत् के धर्म को सम्बल दिया क्या!
सुयोधन था खड़ा कल तक जहाँ पर,
न हैं क्या आज पाण्डव ही वहाँ पर?

“उन्होंने कौन-सा अपधर्म छोड़ा?
किये से कौन कुत्सित कर्म छोड़ा?
गिनाऊँ क्या? स्वयं सब जानते हैं,
जगद्गुरु आपको हम मानते हैं,

“शिखण्डी को बनाकर ढाल अर्जुन,
हुआ गांगेय का जो काल अर्जुन,
नहीं वह और कुछ, सत्कर्म ही था।
हरे! कह दीजिये, वह धर्म ही था।

“हुआ सात्यकि बली का त्राण जैसे,
गये भूरिश्रवा के प्राण जैसे.
नहीं वह कृत्य नरता से रहित था,
पतन वह पाण्डवों का धर्म-हित था।

“कथा अभिमन्यु की तो बोलते हैं,
नहीं पर, भेद यह क्यों खोलते हैं?
कुटिल षड्यन्त्र से रण से विरत कर,
महाभट द्रोण को छल से निहत कर,

“पतन पर दूर पाण्डव जा चुके हैं,
चतुर्गुण मोल बलि का पा चुके हैं।
रहा क्या पुण्य अब भी तोलने को?
उठा मस्तक, गरज कर बोलने को?

“वृथा है पूछना, था दोष किसका?
खुला पहले गरल का कोष किसका?
ज़हर अब तो सभी का खुल रहा है,
हलाहल से हलाहल धुल रहा है।

“जहर की कीच में ही आ गये जब,
कलुष बन कर कलुष पर छा गये जब,
दिखाना दोष फिर क्या अन्य जन में,
अहं से फूलना क्या व्यर्थ मन में?

“सुयोधन को मिले जो फल किये का,
कुटिल परिणाम द्रोहानल पिये का, मगर,
पाण्डव जहाँ अब चल रहे हैं,
विकट जिस वासना में जल रहे हैं,

“अभी पातक बहुत करवायगी वह,
उन्हें, जानें, कहाँ ले जायगी वह।
न जानें, वे इसी विष से जलेंगे,
कहीं या बर्फ में जाकर गलेंगे?

“सुयोधन पूत या अपवित्र ही था,
प्रतापी वीर मेरा मित्र मित्र ही था।
किया मैंने वही, सत्कर्म था जो,
निभाया मित्रता का धर्म था जो।

“नहीं किञ्चित् मलिन अन्तर्गगन है,
कनक-सा ही हमारा स्वच्छ मन है;
अभी भी शुभ्र उर की चेतना है,
अगर है, तो यही बस, वेदना है।

“वधूजन को नहीं रक्षण दिया क्यों?
समर्थन पाप का उस दिन किया क्यों
न कोई योग्य निष्कृति पा रहा हूँ,
लिये यह दाह मन में जा रहा

“विजय दिलवाइये केशव! स्वजन को,
शिथिल, सचमुच, नहीं कर पार्थ! मन को।
अभय हो बेधता जा अङ्ग अरि का,
द्विधा क्या, प्राप्त है, जब सङ्ग हरि का!

“मही! ले सौंपता हूँ आप रथ मैं,
गगन में खोजता हूँ अन्य पथ मैं।
भले ही लील ले इस काठ को तू,
न पा सकती पुरुष विभ्रोट् को तू।

“महा निर्वाण का क्षण आ रहा है,
नया आलोक स्यन्दन आ रहा है,
तपस्या से बने हैं यन्त्र जिसके,
कसे जप-याग से हैं तन्त्र जिसके

“जुते हैं कीर्त्तियों के वाजि जिसमें,
चमकती है किरण की राजि जिसमें;
हमारा पुण्य जिसमें झूलता है,
विभा के पद्म-सा जो फूलता है।

“रचा मैंने जिसे निज पुण्य-बल से,
दया से, दान से, निष्ठा अचल से;
हमारे प्राण-सा ही पूत है जो,
हुआ सद्धर्म से अद्भूत है जो;

“न तत्त्वों की तनिक परवाह जिसको,
सुगम सर्वत्र ही है राह जिसको;
गगन में जो अभय हो घूमता है,
विभा की ऊर्मियों पर झूलता है।

“अहा! आलोक-स्यन्दन आन पहुँचा,
हमारे पुण्य का क्षण आन पहुँचा।
विभाओ सूर्य की! जय-गान गाओ,
मिलाओ, तार किरणों के मिलाओ।

“प्रभा-मण्डल! भरो झङ्कार, बोलो!
जगत् की ज्योतियो! निज द्वार खोलो!
तपस्या रोचिभूषित ला रहा हूँ,
चढ़ा मैं रश्मि-रथ पर आ रहा हूँ।”

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गगन में बद्ध कर दीपित नयन को,
किये था कर्ण जब सूर्यस्थ मन को,
लगा शर एक ग्रीवा में सँभल के,
उड़ी ऊपर प्रभा तन से निकल के!

गिरा मस्तक मही पर छिन्न होकर!
तपस्या-धाम तन से भिन्न होकर।
छिटक कर जो उड़ा आलोक तन से,
हुआ एकात्म वह मिलकर तपन से

रण में, मचा घनघोर हाहाकार रण में।
उठी कौन्तेय की जयकार की जयकार
सुयोधन बालकों-सा रो रहा था!
खुशी से भीम पागल हो रहा था!

सारे, नतानन देवता नभ से सिधारे।
फिरे आकाश से सुरयान सुरयान
छिपे आदित्य होकर आर्त्त घन में,
उदासी छा गयी सारे भुवन में।

अनिल मन्थन व्यथित – सा डोलता था,
न पक्षी भी पवन में बोलता था।
प्रकृति निस्तब्ध थी, यह हो गया क्या?
हमारी गाँठ से कुछ खो गया क्या?

मगर, कर भङ्ग इस निस्तब्ध लय को,
गहन करते हुए कुछ और भय को,
जयी उन्मत्त हो हुङ्कारता था,
उदासी के हृदय को फाड़ता था।

युधिष्ठिर प्राप्त कर निस्तार भय से,
प्रफुल्लित, हो बहुत दुर्लभ विजय से,
दृगों में मोद के मोती सजाये,
बड़े ही व्यग्र हरि के पास आये।

कहा, “केशव! बड़ा था त्रास मुझको,
नहीं था यह कभी विश्वास मुझको,
कि अर्जुन यह विपद् भी हर सकेगा,
किसी दिन कर्ण रण में मर सकेगा।

इसी के त्रास में अन्तर पगा था,
हमें वनवास में भी भय लगा था।
कभी निश्चिन्त मैं क्या हो सका था?
न तेरह वर्ष सुख से सो सका था।

“बली योद्धा बड़ा विकराल था वह!
हरे! कैसा भयानक काल था वह?
मुषल विष में बुझे थे, बाण क्या थे!
शिला निर्मोघ ही थी, प्राण क्या थे!

“मिला कैसे समय निर्भीत है यह?
हुई सौभाग्य से ही जीत है यह।
नहीं यदि आज ही वह काल सोता,
न जानें, क्या समर का हाल होता?”

उदासी में भरे भगवान् बोले,
“न भूलें आप केवल जीत को ले।
नहीं पुरुषार्थ केवल जीत में है।
विभा का सार शील पुनीत में है।

“विजय क्या .जानिये, बसती कहाँ है?
विभा उसकी अजय हँसती कहाँ है?
भरी वह जीत के हुङ्कार में है,
छिपी अथवा लहू की धार में है?

“हुआ जानें नहीं, क्या आज रण में?
मिला किसको विजय का ताज रण में?
किया क्या प्राप्त? हम सबने दिया क्या?
चुकाया मोल क्या? सौदा लिया क्या?

“समस्या शील की, सचमुच गहन है।
समझ पाता नहीं कुछ क्लान्त मन है।
न हो निश्चिन्त कुछ अवधानता है।
जिसे तजता, उसी को मानता है।

“मगर, जो हो, मनुज सुवरिष्ठ था वह ।
धनुर्धर ही नहीं, धर्मिष्ठ था वह।
तपस्वी, सत्यवादी था, व्रती था,
बड़ा ब्रह्मण्य था, मन से यती था।

“हृदय का निष्कपट, पावन क्रिया का,
दलित-तारक, समुद्धारक त्रिया का।
बड़ा बेजोड़ दानी था, सदय था,
युधिष्ठिर! कर्ण का अद्भुत हृदय था।

“किया किसका नहीं कल्याण उसने?
दिये क्या-क्या न छिपकर दान उसने?
जगत् के हेतु ही सर्वस्व खोकर
मरा वह आज रण में निःस्व होकर।

“उगी थी ज्योति जग को तारने को।
न जनमा था पुरुष वह हारने को।

मगर, सब कुछ लुटा कर दान के हित,
सुयश के हेतु, नर-कल्याण के हित।
“दया कर शत्रु को भी त्राण देकर,
खुशी मित्रता पर प्राण देकर,

गया है कर्ण भू को दीन करके,
मनुज-कुल को बहुत बलहीन करके।
“युधिष्ठिर! भूलिये, विकराल था वह,
विपक्षी था, हमारा काल था वह।

अहा! वह शील में कितना विनत था?
दया में, धर्म में कैसा निरत था!
“समझ कर द्रोण मन में भक्ति भरिये,
पितामह की तरह सम्मान करिये।
मनुजता का नया नेता उठा है।
जगत् से ज्योति का जेता उठा है!”

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