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रश्मिरथी तृतीय सर्ग | Rashmirathi Krishna Ki Chetavani | Rashmirathi Poem

by Sandeep Kumar Singh

रश्मिरथी तृतीय सर्ग ( Rashmirathi Krishna Ki Chetavani )  “ रश्मिरथी ” महाभारत के पात्र कर्ण के जीवन और चरित्र पर रचा गया काव्य है। जिसमें उनके जीवन से लेकर मृत्यु तक की सभी घटनाएं सम्मिलित की गयी हैं। कर्ण के द्वारा कवि ने यह सन्देश हम तक पहुँचाने का प्रयास किया है कि मानव जीवन में किसी कुल या वंश में जन्म लेने से ही श्रेष्ठता नहींं आती। व्यक्ति उत्तम बनता है अपने गुणों और व्यव्हार से

रश्मिरथी तृतीय सर्ग

 

रश्मिरथी किसकी रचना है
Rashmirathi Kiski Rachna Hai

इस काव्य को ‘ राष्ट्रकवि ’ के नाम से प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर जी ( Rashmirathi Written By Ramdhari Singh Dinkar ) द्वारा लिखा गया है। कर्म की महत्वता और नैतिकता का पाठ पढ़ाता यह काव्य ऐसे शब्दों से सुसज्जित है जिन्हें पढ़कर मन में उत्तम कर्म करने की प्रेरणा पैदा होती है। जीवन के कठिन समय में भी कैसे संयम बनाये रखना है, कर्ण के माध्यम से यह सन्देश जन-जन को दिया गया है।

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रश्मिरथी किसे कहा गया है

रश्मिरथी का अर्थ होता है एक ऐसा रथसवार (रथी ) जिसका रथ सूर्य की किरणों ( रश्मि ) का बना हो। इस काव्य में रश्मिरथी सुर्यपुत्र कर्ण को कहा गया है क्योंकि कर्ण का चरित्र सूर्य की किरणों की तरह पवित्र है। और उसकी महानता सूर्य की किरणों के भांति किसी से छिपी नहींं अपितु सबके सामने है।

रश्मिरथी के तृतीय सर्ग में उस समय का वर्णन किया गया है। जब पांडव अज्ञातवास पूरा कर वापस आ जाते हैं और भगवान श्री कृष्ण कौरवों और पांडवों में सुलह करवाने के लिए हस्तिनापुर जाते हैं। भगवान् श्री कृष्णा के कहने पर दुर्योधन पांडवों को पांच गाँव तो नहींं देता उल्टा सैनिकों से उन्हें ही बंदी बनाने को कहा। आगे क्या हुआ आइये पढ़ते हैं  और आनंद लेते हैं रश्मिरथी तृतीय सर्ग ” कृष्ण की चेतावनी ” ( Rashmirathi Krishna Ki Chetavani ) कविता में :-

रश्मिरथी तृतीय सर्ग भाग 1

हो गया पूर्ण अज्ञात वास,
पाडंव लौटे वन से सहास,
पावक में कनक-सदृश तप कर,
वीरत्व लिए कुछ और प्रखर,

नस-नस में तेज-प्रवाह लिये,
कुछ और नया उत्साह लिये।

सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहींं विचलित होते,
क्षण एक नहींं धीरज खोते,

विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।

मुख से न कभी उफ कहते हैं,
संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं,
उद्योग-निरत नित रहते हैं,

शूलों का मूल नसाने को,
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।

है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़।

मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।

गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।

बत्ती जो नहींं जलाता है
रोशनी नहींं वह पाता है।

पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,
झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार,
बनती ललनाओं का सिंगार।

जब फूल पिरोये जाते हैं,
हम उनको गले लगाते हैं।

वसुधा का नेता कौन हुआ?
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?

जिसने न कभी आराम किया,
विघ्नों में रहकर नाम किया।

जब विघ्न सामने आते हैं,
सोते से हमें जगाते हैं,
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,
तन को झँझोरते हैं पल-पल।

सत्पथ की ओर लगाकर ही,
जाते हैं हमें जगाकर ही।

वाटिका और वन एक नहींं,
आराम और रण एक नहींं।
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,
पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।

वन में प्रसून तो खिलते हैं,
बागों में शाल न मिलते हैं।

कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,
छाया देता केवल अम्बर,
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,
लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।

जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,
वे ही शूरमा निकलते हैं।

बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,
मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे,
तन को पत्थर बन जाने दे।

तू स्वयं तेज भयकारी है,
क्या कर सकती चिनगारी है?

पढ़िए :- प्रेरणादायक कविता अँधियारा

कृष्ण की चेतावनी भाग 2 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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