Home कहानियाँ पेरेंट्स मीटिंग का एक किस्सा – ज्यादा के लालच में थोड़ा भी खो देने की कहानी

पेरेंट्स मीटिंग का एक किस्सा – ज्यादा के लालच में थोड़ा भी खो देने की कहानी

by Sandeep Kumar Singh

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पेरेंट्स मीटिंग का एक किस्सा :- भगवान् ने हमें कुछ चीजें दी हैं लेकिन हम उन चीजों को नजरंदाज कर के कई और चीजों की लालसा करने लगते हैं। हम उस चीज की तरफ ध्यान ही नहीं देते जो हमारे पास है और उसका प्रयोग कर हम वो चीज भी हासिल कर सकते हैं जो हमारे पास नहीं है। जिंदगी में ऐसा एक ही बार और एक ही व्यक्ति के साथ नहीं होता। बहुत से लोगों के साथ ऐसा होता है।

ख़ास कर बच्चों की परीक्षाओं के दौरान ऐसी घटनाएं आम तौर पर देखने को मिलती हैं जब वे आसान प्रश्नों को ये सोच कर याद नहीं करते कि मुय्श्किल प्रश्नों को याद कर के आसान प्रश्नों को याद करेंगे। इसी चक्कर में वे आसान प्रश्नों को भी याद नहीं कर पाते और परीक्षाओं में उनके नतीजे खराब निकलते हैं। और बाद में उसका अक्रन अध्यापक को मन जाता है।

ऐसी ही एक स्थिति मेरे सामने भी आई। ये पेरेंट्स मीटिंग का एक किस्सा है ।  जिसे देख कर मैं हैरान भी हुआ और मुझे हंसी भी आई। बात वही थी कि इन्सान शिकायत करने का आदी हो चुका। आइये जानते हैं मेरे साथ घटी इस घटना के जरिये की कैसे एक ऐसी चीज जो आपके नियत्रण में न हो उस चीज से भी आपका नियंत्रण छीन लेती है ओ आपके नियंत्रण में होती है। आइये जानते हैं कैसे इस कहानी में :- ‘ पेरेंट्स मीटिंग का एक किस्सा ‘

पेरेंट्स मीटिंग का एक किस्सा

महीने का दूसरा शनिवार था। परीक्षा का परिणाम देने के लिए अभिवावक सम्मलेन रखा गया था। जिसे आज कल पेरेंट्स मीटिंग भी कहते हैं। ये वो दिन होता है जब बच्चों से ज्यादा माँ-बाप को इस बात की परेशानी होती है की उनके लाडले या लाडली ने उत्तर पुस्तिका में क्या गुल खिलाये हैं। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे परीक्षा बच्चों की नहीं अपितु माता-पिता की ली गयी है। खैर जैसे-तैसे सभी अभिवावक आ जा रहे थे।

तभी अचानक एक मोहतरमा अपनी बेटी को लेकर मेरे पास पहुंची। हालाँकि वो मेरी कक्षा की लड़की नहीं थी परन्तु उनकी कक्षा में मैं सामाजिक शिक्षा का विषय पढ़ाता था। जिसमे भूगोल,इतिहास और नागरिक शास्त्र विषय हुआ करते हैं। हाँ-हाँ जानता हूँ आप सबको बोरिंग लगता है। मुझे नहीं लगता, अध्यापक हूँ ना ऐसा बोलना पड़ता है। तो मैं बात कर रहा था उन मोहतरमा की।

“सर, देखिये मेरी बेटी के कितने कम नंबर आये हैं। आपने इतने बड़े-बड़े उत्तर लिखवाए थे कि इसे याद ही नही हुए। बाकी सब सब्जेक्ट्स में तो ठीक हैं। सिर्फ आपके ही सब्जेक्ट में कम हैं। बताइए क्या किया जाए?”

उनकी आवाज में थोड़ा गुस्सा और विरोधाभास सा।

मुझ पर इतनी बड़ी तोहमत। दिल में तो आया कि उन्हें ये बोलूं की उत्तर तो आगे की कक्षाओं में बड़े ही होंगे। लेकिन मैंने संयम रखा। अब मेरी बारी थी।

“बेटा, एग्जाम में कितने बड़े प्रश्न आये थे?”

मैंने पास खड़ी उनकी बेटी से पूछा। ये मेरी आदत है मैं सबको बेटा ही बुलाता हूँ। अरे! मेरा मतलब सब बच्चों को।

“सर तीन आये थे।”

उस लड़की की माँ ऐसे देखने लगी जैसे कोई जंग हार रही हो। और मैं किसी विजय रथ पर पैर रखने जा रहा हूँ। इस से पहले कोई और कुछ बोलता मैंने एक सवाल और दाग दिया।

“बेटा कितने नंबर का एक क्वेश्चन था?”

“सर पांच नंबर का।”

“ओके, और एग्जाम कितने मार्क्स का था?”

“सर हंड्रेड मार्क्स ( १०० नंबर ) का।”

बस मेरे सवाल पूरे हो गए थे और अब मेरे अन्दर एक अध्यापक की जगह एक वकील की भावना प्रवेश कर चुकी थी। वकील बन जाने के बाद ये केस हारना मुझे गंवारा न था।

मैंने उसकी माँ से ऐसे सवाल किया जैसे वो किसी कटघरे में कड़ी हों।

“अगर 100 नंबर के पेपर में बड़े क्वेश्चन 15 नंबर के थे तो बाकी के 85 नंबर का पेपर क्यों नहीं किया इसने? उसमें कम से कम 65-70 नंबर तो आते।”

एक ही दाव में मैंने चारों खाने चित्त कर दिया उन्हें। अब क्या बोलती बेचारी। लगीं अपनी बेटी की तरफ देखने। मुझे तो लगा कि गयी बेचारी अब। मैंने उसे बचने के प्रयास में जैसे ही बोलना चाहा,

“तो अगली बार से इसे पहले छोटे प्रश्न उत्तर याद करवाऊं?”

उन्होंने मुझसे सवाल किया।

“अगर इस बार भी आपने करवाए होते तो शायद ये बड़े प्रश्न भी याद कर लेती।”

“हम्म्म्म….सही बोल रहें है आप। थैंक यू अगली बार से इसे पहले बाकी का काम याद करवाउंगी।”

मुझे ख़ुशी थी की वो समझ चुकी थीं मैं क्या कहना चाहता था। इस बात की मुझे बहुत ख़ुशी हुयी कि उन्होंने एक समझदार माँ की भांति अपनी भी गलती स्वीकार की। उसके बाद वे चली गयीं।

बस ऐसा ही हमारी जिंदगी में भी होता है। हम चाहते हैं कि बिना ज्यादा प्रयास किये हम कुछ बड़ा प्राप्त कर लें। परन्तु जीवन में ऐसा संभव नहीं है। हर शुरुआत हमेशा छोटी ही होती है। कुछ बड़ा होता है तो उसका परिणाम। अगर आपको परिणाम अच्छा चाहिए तो पहले वो काम करें जो आप कर सकते हैं। जैसे-जैसे वो काम आप कर लेंगे। वैसे-वैसे आप के अन्दर आत्मविश्वास बढ़ता जाएगा। उसके बाद आप वो बड़े काम भी आसानी से कर लोगे जो आपको पहले कठिन लगते थे।

परीक्षाओं में सफलता का यही मूल मंत्र है। हमेशा पहले वही याद करें जो आप कर सकते हैं। इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ता जाएगा। यदि आप ऐसा नहीं करते तो आप जिन प्रश्नों को  ज्यादा समय देंगे वो आपके द्वारा याद किये जा सकने वाले प्रश्नों का भी समय ले लेंगे। याद किये जा सकने वाले प्रश्नों के बाद आप आराम से उन प्रश्नों को समय दे सकते हैं और यदि किसी करणवश वो आपको याद नहीं भी होते तो तो आप दूसरे प्रश्नों की सहायता से अच्छे अंक तो प्राप्त कर ही सकते हैं।

कुछ भी करना है तो बस एक शुरुआत करें। कदम बढ़ाएंगे तभी मंजिल और खुद के बीच फासले कम होंगे। सिर्फ सोचने भर से कुछ हासिल न होगा। बस कदम वापस मत लें। जिंदगी की हर वो चीज आपकी मुट्ठी में होगी जो आप चाहते हैं। अंत में बस इतना ही कहना चाहूँगा,

“सोच को हकीकत में बदलना है तो, योजना पर काम करो,
मिल जाएंगे चाँद और तारे भी तुम्हें, बस अपनी मेहनत से तुम शाम करो।”

आपके इस घटना के बारे में क्या विचार हैं हमें अवश्य बताएं। अगर आपके साथ भी ऐसी कोई घटना घटी है तो हमारे साथ जरूर शेयर करें।

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धन्यवाद।

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