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किस्मत पर एक कविता ” मुजरा किस्मत का ” यह कविता किस्मत की बेरुखी, समाज की दोहरी सोच और इंसान की मजबूरी को गहरे प्रतीकों के साथ उजागर करती है। जब मेहनत के बावजूद इंसान बदनाम हो और किस्मत अपनों की नहीं, बल्कि ताक़तवरों की सुनने लगे—तब दिल से निकली आवाज़ कविता बन जाती है। यह किस्मत पर कविता उसी दर्द, संघर्ष और सवालों को शब्द देती है, जिनसे हर आम इंसान कभी न कभी गुज़रता है।
किस्मत पर कविता
Kismat Poem In Hindi

तवायफ बन चुकी किस्मत
मुजरा सरेआम करती है।
जितना संभालूँ मैं खुद को ये
मुझे बदनाम करती है।
अमीरों के कोठों पर
चलती है उनकी खातिर।
मेरे कहने पे न मेरा
इक भी काम करती है।
तवायफ बन चुकी किस्मत
मुजरा सरेआम करती है।
मेरी हर हरकत जो होती है
हिमाकत उनको लगती है।
हिमायत उनकी कर दूँ
तो भलाई मेरी होती है।
उनके लिये करता तो
सब काम बनते हैं।
अपने लिए सोचूँ तो
हर बात बिगड़ती है।
तवायफ बन चुकी किस्मत
मुजरा सरेआम करती है।
है डर हार ना जाऊं
जंग जिंदगी से मैं।
पाऊँगा खुदा इक दिन
अपनी बंदगी से मैं।
हैं जो हालात बदलेंगे
जारी कोशिशें जो हैं।
हिम्मत के आगे कहाँ
मुसीबतें ठहरती हैं।
तवायफ बन चुकी किस्मत
मुजरा सरेआम करती है।
यह कविता केवल शिकायत नहीं, बल्कि संघर्ष के बीच उम्मीद की लौ भी है। हालात चाहे कितने ही कठिन क्यों न हों, हिम्मत और कोशिश के आगे एक दिन किस्मत को भी झुकना पड़ता है। अगर यह किस्मत और जिंदगी पर कविता आपके दिल को छू गई हो, तो समझिए—यह सिर्फ़ शब्द नहीं, एक सच्चा एहसास है। क्योंकि अंत में, हिम्मत के आगे ही किस्मत की चाल ठहरती है। किस्मत पर एक कविता आपको कैसी लगी ? अपने विचार हम तक जरूर पहुंचाएं।
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धन्यवाद।


1 comment
Mai apki ek line mare ek song ke liye use karna tha… Atcha laga …. Plz use Karu sir