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खालसा पंथ की स्थापना :- सिख धर्म में बैसाखी का महत्व | Khalsa Panth Ki Sthapna

by Sandeep Kumar Singh
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खालसा पंथ की स्थापना होने से पहले भारत में मुगलों का शासन था और उनका अत्याचार औरंगजेब के शासन में चरम पर था। हिन्दुओं पर वो लागातार जुल्म कर रहे थे। उस समय औरंगजेब का विरोध दक्षिण से वीर मराठा शिवाजी और उत्तर से गुरु गोबिंद सिंह जी कर रहे थे। गुरु गोबिंद सिंह जी के पिता श्री गुरु तेग बहादुर जी को औरंगजेब के हुक्म से ही चांदनी चौंक में शहीद कर दिया गया था।

लोग जुल्म सह-सह कर शारीरिक ही नहीं मानसिक तौर पर भी गुलाम बन चुके थे। अब उन्हें आजाद होने की कोई उम्मीद नहीं थी। जात-पात का भेदभाव भी बढ़ गया था। इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह जी को यह महसूस हुआ की समाज की रक्षा और लोगों की हालत को सुधारने के लिए उन्हें कुछ करना चाहिए। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने 13 अप्रैल, सन 1699 इसवी में उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की। आइये जानते हैं खालसा पंथ की स्थापना के बारे में विस्तार में :-

खालसा पंथ की स्थापना

खालसा पंथ की स्थापना

बात बैसाखी के दिन की है। श्री आनंदपुर साहिब में स्थित केसगढ़ में बहुत बड़ा दरबार सजाया गया था। कीर्तन (पूजा-पाठ) हो जाने के उपरांत श्री गुरु गोबिद सिंह जी तंबू के बहार आये और अपनी तलवार लहरा कर कहने लगे क्या इस भरी सभा में है कोई जो गुरु साहिब के लिए जान देने के लिए तैयार हो। इतना सुनते ही सारी सभा में शांति छा गयी।

गुरु जी के इस तरह कहने पर सभी लोग आश्चर्यचकित थे। आखिर गुरु जी ये क्या कह रहे हैं? इतनी देर में गुरु जी ने दुबारा वही बात दोहरायी। परन्तु इस बार भी कोई न उठा। तीसरी बार फिर वही बात बोली गयी।

इस बार बैठे हुए लोगों के बीच से लहौर के भाई दयाराम उठ कर आगे आये। गुरु गोबिंद सिंह जी उन्हें अपने साथ तंबू में ले गए। अंदर से कुछ गिरने की आवाज आयी। थोड़ी देर बाद श्री गुरु गोबिंद सिंह जी रक्त से लहूलुहान तलवार लेकर बाहर आये। तलवार लहरा कर फिर से उन्होंने एक और शीश की मांग की।

दूसरी बार दिल्ली के ही भाई धरम दास जी आगे आये। फिर से वही घटना घटी और इस तरह गुरु जी ने पांच बार ऐसा किया। जिसमे तीसरी बार जगन्नाथ पुरी (ओड़िसा) से भाई हिम्मत राए, चौथी बार द्वारका (गुजरात) से भाई मोहकम चंद और पांचवीं बार बिदर (कर्नाटक) से भाई साहिब चंद जी ने अपना शीश गरु गोबिंद सिंह जी के चरणों में भेंट किया।

कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह जी उन्हें सुन्दर पोशाक जिसमें पाँच ककार ( केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कच्छा) शामिल थे, धारण करवा कर बाहर लेकर आये। सारी सभा के सामने उन्हें अमृतपान कराया और उन्हें पांच प्यारों की उपाधि दी। बाद में उनसे स्वयं अमृतपान कर खालसा पंथ की स्थापना की। न सिर्फ खालसा पंथ की स्थापना की बल्कि एक ऐसी कौम तैयार की जो मुगलों के जुल्मों का मुंहतोड़ जवाब दे सके। साथ ही सबकी रक्षा भी कर सके।

एक ऐसा पंथ जिसमें जात-पात का कोई भेदभाव नहीं था। सब एक बराबर थे। सबके बस एक गुरु श्री गुरु ग्रन्थ साहिब थे। उस दिन के बाद बैसाखी को एक नया आयाम मिला। और यह त्यौहार सिख धर्म में विशेष स्थान हासिल कर गया।

आज सिख धर्म में बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में बड़े समारोह का आयोजन किया जाता है। पूर्व विश्व में जहाँ भी सिख धर्म के लोग रहते हैं वहां-वहां इस दिवस को मनाया जाता है। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी और पांच प्यारों को समर्पित शब्द गायन किया जाता है।

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धन्यवाद।

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