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इंसानियत पर कविता – आदमियत | Insaniyat Par Kavita

by Praveen

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आज के समय में इंसानियत बहुत ही कम देखने को मिलती है। जमाना कुछ इस कदर बदल गया है की इन्सान के जीवन की कोई कीमत ही नहीं रह गयी है। सब रिश्ते मतलबी हो चुके हैं। लोग पूर्ण रूप से स्वार्थी हो चुके हैं। इन्हीं भावनाओं को प्रस्तुत किया गया है इस ‘ इंसानियत पर कविता – आदमियत ‘ में :-

इंसानियत पर कविता – आदमियत

इंसानियत पर कविता - आदमियत

सन्नाटे के आगोश में है,
बदहवास सी मधुशाला।
लहू का दौर है।
कौन पीता है हाला।

बड़ी अजीब सी है,
शहरों की रौशनी।
मिलकियत से है प्रेम,
ओर आदमियत से दुश्मनी।

उजालों के बावजूद,
फरेब पहचानना है मुश्किल।
हाथ की लकीरे किस्मत,
है निकम्मो की दलील।

मक्कारी पेशा हो गई है
ठगों के धड़े है।
सरमायेदारों के ही,
मुक़्क़द्दर बिगड़े है।

इतराता है मेघ,
जो अपनी बुलंदी पर।
भूल जाता है झल्ला,
बरसता तो है जमी पर।

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Praveen kucheriaमेरा नाम प्रवीण हैं। मैं हैदराबाद में रहता हूँ। मुझे बचपन से ही लिखने का शौक है ,मैं अपनी माँ की याद में अक्सर कुछ ना कुछ लिखता रहता हूँ ,मैं चाहूंगा कि मेरी रचनाएं सभी पाठकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनें।

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धन्यवाद।

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