गर्मी पर हास्य कविता :- ग्रीष्म ऋतु पर एक मजेदार कविता | गर्मी में बुरा है हाल हुआ

बढ़ती हुयी गर्मी में कई ऐसी समस्याएँ सामने आती हैं जिनसे निजात पाना हमारे बस की बात नही होती या फिर हम मात्र थोड़े समय के लिए ही उस समस्या से दूर हो पाते हैं। जैसे की धूप से, पसीने से, गर्मी आदि से। ऐसे मौसम के दौरान हमारी स्थिति किस प्रकार की होती है बस यही प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है इस कविता में । आइये पढ़ते हैं गर्मी पर हास्य कविता :-

गर्मी पर हास्य कविता

गर्मी पर हास्य कविता

जाने ये कैसा बवाल हुआ
अपना जीना मुहाल हुआ,
नहा रहे है सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।

नींद न आती रातों को
पंखे एसी सब फेल हुए
खुद के घर भी अब तो जैसे
लगे तिहाड़ के जेल हुए,
रोता छोटा बच्चा अब तो
अपने जी का जंजाल हुआ
नहा रहे है सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।

बादल भी देखो उमड़-उमड़ कर
अपने रंग दिखाता है
उम्मीद बंधे जब बरखा की
सबको ये ठेंगा दिखाता है,
शीत लहर तन में लगना
अब तो जैसे एक ख्याल हुआ
नहा रहे है सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।

एक सन्नाटा सा छाया है
न हवा ही है किसी ओर बहे
साथी हैं बने मच्छर अपने
रो-रो कर अपने किस्से कहें,
नींद उड़ी है रातों की
दिन में बुरा है हाल हुआ
नहा रहे है सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।

जाने किसका गुस्सा हम पर
सूर्य देव हैं निकाल रहे,
आलू की तरह क्यों हमको
दिन-रात ही ये उबाल रहे,
जाने कौन सी खता हमारी
मन में खड़ा है यही सवाल हुआ
नहा रहे है सब बिन पानी
गर्मी में बुरा है हाल हुआ।

पढ़िए :- कविता ‘शरद ऋतु की सुबह’

गर्मी पर हास्य कविता आपको कैसी लगी ? इस बारे में अपने विचार कमेंट बॉक्स के जरिये हम तक अवश्य पहुंचाएं।

धन्यवाद।

2 Comments

  1. Avatar SUSHIL KUMAR MISHRA
    • Sandeep Kumar Singh Sandeep Kumar Singh

Add Comment