सोइचिरो होंडा की सक्सेस स्टोरी – एक इंटरनेशनल ब्रांड की अनसुनी कहानी

होंडा के बारे में शायद ही कोई ऐसा हो जो न जानता हो। भारत में पहले मोटरसाइकिल चलते थे। जिनका नाम हीरोहोंडा होता था। आज कल यह बदल कर हीरो हो गया है। होंडा वापस चला गया। लेकिन ये आया कहाँ से था? और कौन था ये? जानिए होंडा का पूरा इतिहास और इसके एक इंटरनेशनल ब्रांड बनने की कहानी ” सोइचिरो होंडा की सक्सेस स्टोरी ” में :-

सोइचिरो होंडा की सक्सेस स्टोरी

सोइचिरो होंडा की सक्सेस स्टोरी

सोइचिरो होंडा (Soichiro Honda ) का जन्म 1906 में जन्मे हमामत्सु( Hamamatsu ) के बाहर एक छोटे से गांव में हुआ था। होंडा  के पिता, गिहेई ( Gihei ), एक लोहार थे जो साइकिल भी ठीक करते थे।

सन 1910 में पहली बार होंडा के जीवन में कुछ ऐसा घटा जिसके बाद उनके अन्दर एक मशीनों के लिए बहुत तेज जिज्ञासा पैदा हुई1910 ये जिज्ञासा इतनी तेज थी की जहाँ सबको मशीन की आवाज से परेशानी होती थी वहीं होंडा को ये आवाजें मधुर संगीत की तरह प्यारी लगती थीं। ये गह्तना तब घटी जब एक एक फोर्ड मॉडल टी कार होंडा के गाँव की सड़कों पर धुल उड़ाती हुयी गुजरी।

उसी समय से होंडा ने ये विचार बना लिया कि उनके जीवन का उद्देश्य केवल मशीनों का काम और नई मशीनों का आविष्कार करना होगा।

15 साल की उम्र में होंडा ने पढ़ाई छोड़ दी और नौकरी ढूँढने टोक्यो चले गए। वहां उन्हें आर्ट शोकाई ( Art Shokai  ) में, जोकि ऑटोमोबाइल और मोटरसाइकिल रिपेयर की दुकान थी, मैकेनिक के सहायक के तौर पर नौकरी मिल गयी। आर्ट शोकाई का मालिक होंडा के काम से काफी प्रभावित हुआ। लेकिन अभी उसे मैकेनिक का काम नहीं दिया गया था। कारण था उसकी कम उम्र होना। ऐसा माना जाता था कि एक कुशल मैकेनिक बनने के लिए कम से कम 10 साल काम सीखना पड़ता था।

होंडा तो जल्द से जल्द अपने हाथों में औजार चाहते थे जिस से वो मशीनों के साथ खेल सकें। भाग्य ने उनका साथ दिया और सितम्बर 1923 में महान कांटो भूकंप ( Great Kanto earthquake ) आया। यह भूकंप 10 मिनट तक रहा। यह भूकंप इतना तेज था कि 93 टन और 40 फुट ऊंची बुद्ध की एक मूर्ती 2 फुट तक खिसक गयी। 1,40,000 से ज्यादा लोग मारे गए।

आर्ट शोकाई तो बच गया लेकिन वहां के ज्यादातर मैकेनिक अपने परिवार की देख भाल के लिए नौकरी छोड़ के चले गए। सोइचिरो का घर दूर और सुरक्षित था इसलिए उसने वहीं रह कर मौका संभाला और मैकेनिक की कमी होने के कारण मैकेनिक का काम करने लगा।

5 साल काम करने और अच्छी तरह सीखने के बाद होंडा अपने गाँव हमामत्सु( Hamamatsu ) वापस आ गए और आकार यहाँ आर्ट शोकाई की एक ब्रांच खोल ली। उस समय लकड़ी के पहिये चला करते जो अक्सर ठोकरों पर टूट जाया करते थे। इस से बहुत एक्सीडेंट हुआ  करते थे। होंडा ने उस समय कच्चे लोहे से बने तीली वाले पहिए की खोज की। इसके बाद तो दूकान की किस्मत ही बदल गयी। ये पहिये मजबूत थे जिससे एक्सीडेंट भी बहुत कम होने लगे।

इस  खोज के बाद वह अमीर हो गए। अब उनकी अगली कोशिश थी पिस्टन रिंग बनाना। उन्हें लगता था कि वो सबसे अच्छी पिस्टन रिंग बना सकते हैं। जब उन्होंने पिस्टन रिंग बना कर टोयोटा कंपनी को सैंपल भेजा तो 50 में से 47 सैंपल फेल ही गए। उन्हें पता था कि कमी उनके अंदर है इसलिए उन्होंने इसे स्वीकार किया और इसे सुधारने का निर्णय लिया।

उन्होंने हमामत्सु स्कूल ऑफ़ टेक्नोलॉजी ( Hamamatsu School of Technology ) में एडमिशन लिया और मशीन से जुड़ी हर तरह की शिक्षा प्राप्त की। उन्हें परीक्षा न देने के कारण डिप्लोमा के दूसरे साल में निकल दिया गया। लेकिन वे फिर भी क्लास लेते रहे और इस दौरान वह कई फक्ट्रियों में गए। वहां भी उन्होंने काम सीखा। जब वे सीखने से संतुष्ट हो गए तो उन्होंने बिना डिप्लोमा लिए स्कूल छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने पिस्टन रिंग पर इस तरह काम किया की उससे जुड़े 28 पेटेंट अपने नाम करवा लिए।

उन्होंने टोकाई सेइकी हैवी इंडस्ट्री ( Tokai Seiki Heavy Industry ) नाम से एक कंपनी बनाई। जो पिस्टन रिंग बनाती थी। इनका काम इतना जल्दी फैला कि टोयोटा और नाकाजिमा एयरक्राफ्ट कम्पनी ( Toyota and Nakajima Aircraft Company ) को पार्ट्स भेजने वाली अकेली कंपनी थी।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद होना ने अपने टोकाई सेइकी के शेयर टोयोटा को लगभग $5000 में बेच दिए। इसके बाद वो 12 महीने की छुट्टी पर चले गए। टोयोटा को लगा कि अब होंडा का समय ख़त्म हुआ।

हौंडा मौज मस्ती से अपना समय काटने लगे। सब कुछ अच्छे से चल रहा था कि अचानक उनकी जिंदगी में एक और बदलाव आया। उनकी पत्नी साईकिल से कई घंटे का सफ़र चावल खरीद कर लायी। थके होने और खीझने के कारण उन्होंने होंडा से कहा कि ,

“तुम्हें एक बार ये चावल खरीद कर लाने की कोशिश करनी चाहिए।“

इस बात से होंडा के दिमाग में एक विचार आया कि मैं क्यों जाऊं चावल लेने? और उन्होंने अपनी पत्नी की साइकिल पर एक मोटर लगा दी। ये उनकी नई खोज थी। साइकिल के पैडल मारने से छुट्टी दिलाने वाली इस नई मशीन नेउस गाँव और होंडा की जिंदगी ही बदल डाली। ये मोटर वाली साइकिल बनाने में होंडा को एक दिन का समय लगता था। उस काम में सफलता मिलने के बाद होंडा मोटरसाइकिल के पार्ट्स और इंजन बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्हें थोड़ा इंतजार करना पड़ा।

सितम्बर 1948 में होंडा ने हमामत्सु इंजन बनाने के लिए एक छोटा कारखाना खोला। इस कारखाने  के लिए होंडा के पिता ने अपनी बरसों की बचायी हुई जमापूंजी दे दी। इसके बाद होंडा धीरे-धीरे अपना काम बढ़ाते रहे। 1949 में आखिरकार वह दिन आ ही गया जब सोइचिरो होंडा ने पहली मोटरसाइकिल बनाई। उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। आज भी होंडा 1959 से दुनिया की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल निर्माता है।

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