चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय | Chandrashekhar Azad Ka Jivan Parichay

इस दुनिया में जन्म तो कई लोग लेते हैं लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जो कुछ ऐसा कर जाते हैं। इसके कारण दुनिया उन्हें याद रखती है और उनका सम्मान करती है। ये सब होता है इन्सान की अंतरात्मा जागने के बाद किन्तु कई लोग तो जन्म से ही ऐसी प्रवृत्ति के होते हैं। वो सिर्फ अपने दिल की सुनते हैं। वो अपनी सोच से एक क्रांति लेकर आते हैं। एक ऐसी क्रांति जो इतिहास को बदल कर रख देती है। ऐसे ही एक क्रन्तिकारी युवक थे चन्द्रशेखर आजाद । आइये पढ़ते हैं चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय

चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय

चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय | Chandrashekhar Azad Ka Jivan Parichay

चन्द्रशेखर का जन्म 23 जुलाई, 1906 को भाबरा गाँव (मध्यप्रदेश) जिसका वर्तमान नाम चन्द्रशेखर आजाद नगर है, में हुआ। पंडित सीताराम तिवारी जोकि चन्द्रशेखर आजाद के पिता थे, अलिरापुर रियासत के एक छोटे से कर्मचारी थे। माता जगरानी देवी गृहिणी थीं। 

चन्द्रशेखर के जन्म के समय माता जगरानी देवी कुपोषण का शिकार थीं। चन्द्रशेखर जन्म के समय गोल-मटोल और कांतिवान मुख वाले  थे। इनके एक बड़े भाई थे सुखदेव। पंडित सीताराम और अग्रणी देवी कि पहली तीन संताने काल का ग्रास बन गयी थीं। अब उनके केवल दो ही पुत्र थे।

पंडित सीताराम जिस इलाके में रहते थे। वह क्षेत्र अधिकतर आदिवासी था। वहां एक ऐसा अंधविश्वास भी था कि अगर किसी बालक को शेर का मांस खिला दिया जाए तो वो बड़ा होकर शेर कि तरह बहादुर बनता है। इसी कारण पंडित सीताराम ने चन्द्रशेखर को बचपन में ही शेर का मांस खिला दिया। पता नहीं ये शेर के मांस का असर था या फिर चन्द्रशेखर का हौसला। दीपावली की एक रात को जब  कुछ बच्चों ने उन्हें छः-सात फुलझड़िया एक साथ जलने को कहा तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट फुलझड़ियाँ हाथों में पकड़ कर जला दी। इससे उनका हाथ जल रहा था लेकिन बच्चों की ख़ुशी के लिए हँसते-हँसते फुलझड़ियाँ जलाते रहे।

जब चन्द्रशेखर आजाद पाठशाला जाने लगे तो उनके पिता ने उनकी शिक्षा को और बेहतर बनाने के लिए विद्यालय की पढाई के बाद भी एक सरकारी कर्मचारी मनोहरलाल त्रिवेदी को उन्हें पढ़ने के लिए बुलाया।  मनोहरलाल त्रिवेदी के अनुसार किसी भी विद्यार्थी को बस छड़ी के डर से ही उत्तम शिक्षा दी जा सकती है। इस कारण वे अपने साथ एक छड़ी जरुर रखा करते थे। जब भी विद्यार्थी कोई गलती करते वे उसी क्षण उन्हें छड़ी मार दिया करते।

एक बार पढ़ाते हुए मनोहरलाल त्रिवेदी जी ने कुछ गलती कर दी चन्द्रशेखर आजाद ने पास में रखी हुयी छड़ी उठाई और झट से मास्टर जी को दे मारी। इस स्थिति से मास्टर जी घबरा गए। उसी क्षण सीताराम तिवारी जी बहार आये और पुछा कि क्या हुआ? तब चन्द्रशेखर ने कहा ,
“जब हम कोई गलती करते है तो उसके दंडस्वरूप मास्टर जी हमे दो छड़ी मारते हैं। अब उन्होंने गलती की तो क्या उन्हें मार नहीं पड़नी चाहिए?”

यह सुन कर सब अवाक् रह गए। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि चन्द्रशेखर को क्या समझाया जाए। लेकिन एक बात सिद्ध हो चुकी थी कि चन्द्रशेखर नियमों के पक्के थे।



चन्द्रशेखर संस्कृत सीखने के लिए काशी जाना चाहते थे परन्तु उनके माता-पिता उन्हें अपने से दूर नहीं भेजना चाहते थे। संस्कृत विद्या प्राप्ति के लिए आजाद ने एक फैसला लिया और परिवार के साफ़ इंकार करने के बाद वे घर छोड़ कर काशी के लिए निकल पड़े। काशी पहुँच कर उन्होंने अपनी सिक्षा आरंभ की और अपने घर वालों को चिट्ठी लिख कर वहां पहुँचने कि सूचना दे दी।

वहाँ पर संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए सहायता उपलब्ध थी। उनके रहने और अन्य जरूरतों की पूर्ती के लिए कई लोग दान दिया करते थे। वहां रहते हुए वे अपने शरीर पर भी ध्यान देते थे। इसीलिए उनका शरीर एक पहलवान की भांति दिखता था। अभी चन्द्रशेखर काशी में ही थे कि उन्हें पता चला कि उह्नके भाई सुखदेव को डाकिये की नौकरी मिल गयी है। जिस कारण उनके पिता जी ने भी चन्द्रशेखर के लिए पैसे भेजना आरंभ कर दिया।

कुछ दिनों बाद उन्हें इस बात का एहसास होने लगा कि उनका जीवन किसी और उद्देश्य के लिए है। वो अब भी पुस्तक पढने के लिए ध्यान केन्द्रित करते उनका मन भटकने लगता। उनका मन अब देशभक्ति की तरफ बढ़ रहा था। उसी समय देश में कई आन्दोलन चल रहे थे। बंगालियों के विरोध से अंग्रेज इतने तंग हो गए थे कि उन्होंने भारतियों के मूल अधिकारों के हनन के लिए “रोल्ट एक्ट” लागू कर दिया।

सारे देश में इसका विरोध हो रहा था। तभी जनरल ओ डायर ने जलियांवाला बाग़ में बिना किसी चेतावनी गोलियां चलवाकर कई बेगुनाहों को मार डाला और कई लोगों को अंगहीन कर दिया। ये सब देख कर चन्द्रशेखर को बेचैनी सी होने लगती थी। उन्हें समझ नहीं आती थी कि वे क्या करें।

एक बार वे बाजार से गुजर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि कुछ पुलिसवाले आन्दोलनकारियों को बड़ी बेरहमी से पीट रहे थे। जब चन्द्रशेखर ने यह देखा तो उनसे रहा ना गया। उन्होंने एक पत्थर उठाया और एक पुलिस वाले को मार दिया। बाकी पुलिस वाले जब तक कुछ समझ पाते आजाद वहां से जा चुके थे। उस पुलिस वाले का बुरा हाल हो गया और वो खून से लाल हो गया।

इस घटना के बाद चन्द्रशेखर की खोज आरंभ हुयी और जल्द ही वो पकडे गए।पकडे जाने पर भी उनके मुख पर जरा भी डर ना था। ये पहला अवसर था जब चन्द्रशेखर आजाद ने देश कि सेवा में अपना कदम बढाया था। चन्द्रशेखर को पकड़ कर जेल ले जाया गया। वो दिन सर्दी के दिन थे। इंस्पेक्टर ने सोचा इसकी गर्मी आज अपने आप उतर जाएगी और ये समझ जाएगा कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बोलने का क्या अंजाम होता है।

आजाद को बिना किसी गर्म कपडे के धोती कुरते  जेल में बंद कर दिया गया। तकरीबन आधी रात को जब वह इंस्पेक्टर यह देखने के लिए उठा कि आजाद की हालत देखी जाये। जब वह वहां पहुंचा तो देखा कि आजाद बिना धोती कुरते के लंगोट में ही कसरत कर रहे हैं और उनके शरीर से पसीना ही पसीना बह रहा है। यह देखकर वह इंस्पेक्टर दबे हुए क़दमों से वैसे ही वापस चला गया। ये वो समय था जब चन्द्रशेखर आजाद ने अपने आप को पहचाना और ये जाना कि उनका उद्देश्य देश सेवा है।

अगले दिन अदालत में उनको लेकर जाया गया। अदालत कि कार्यवाही आरम्भ हुयी। मजिस्ट्रेट ने सवाल पूछने शुरू किये ,
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“आजाद।”
“पिता का नाम?”
“स्वतंत्रता।”
“घर कहाँ है?”
“जेल।”
“काम क्या करते हो?”
“देश को आजाद करवाने का।”

मजिस्ट्रेट को वह उत्तर, उत्तर कम थप्पड़ ज्यादा लगे। इसलिए क्रोध में मजिस्ट्रेट ने 15 बेंत लगाने कि कड़ी सा सुनाई। जब उन्हें बेंत मारे जाने लगे तो अंग्रेजो ने सोचा कि जब 2-4 बेंत पड़े तो अपने आप अक्ल ठिकाने आ जाएगी। जैसे ही आजाद को पहला बेंत मारा गया। अंग्रेजों को लगा कि उनके मुंह से चीख निकलेगी लेकिन ऐसा न हुआ। बेंत पड़ने पर अवाज आई,
“भारत माता की जय।”



जितनी बार बेंत पड़ी उतनी बार यही नारा गूंजा। बेंतों के बाद जब कानून के अनुसार उन्हें सांत्वना राशी दी गयी तो उन्होंने वह राशी जेलर के मुंह पर मारी। बहार यह खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी। इसलिए बहुत सारे लोग चन्द्रशेखर के स्वागत के लिए जेल के बहार इकट्ठे हो गए।

उम्र तो सिर्फ 14 साल थी लेकिन शरीर इतना हृष्ट-पुष्ट था कि वो एक नौजवान युवा लगते थे। इस घटना के बाद उनके घर वाले उनको घर वापस ले जाने के लिए आये। परन्तु आजाद अब देश को समर्पित हो चुके थे। उनके लिए अब देश को आजाद करवाने की जिमेवारी हर जिम्मेवारी से बड़ी थी।

सन् 1921 में गाँधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आन्दोलन छेड़ा हुआ था जोकि चौरा-चौरी की घटनाके बाद गांधीजी द्वारा वापस ले लिया गया। यह फैसला बिना किसी से पूछे लिया गया था। जिस कारण देश के तमाम नवयुवकों का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। तब रामप्रसाद बिस्मिल और शचिन्द्र नाथ सान्याल ने अपने-अपने क्रन्तिकारी दलों को मिलकर 1924 में एक दल “हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ ( एच.आर.ए. )” का गठन किया। जिसका मुख्यालय उत्तर प्रदेश में था। आजाद इस पार्टी में नये सदस्यों को भरती करने के लिए अक्सर साधू या पंडित का भेष बना कर घुमते रहते और युवाओं के मन को, चरित्र, उत्साह, विश्वसनीयता समर्पण व उनके साहस को टटोल कर दल का सदस्स्य बना लेते थे।

दल तो अपनी योजनायें बना रहा था और उन पर काम भी कर रहा था। अब समस्या थी पैसों की। इसके बिना कोई भी काम ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता। कोई भी व्यक्ति या संस्था इस दल को पैसे देकर अंग्रेजों से दुश्मनी मोल नहीं ले सकती थी। इसलिए मजबूरन दल के सदस्यों ने यह निष्कर्ष निकाला कि धनि लोगो के घर डाका डाला जाएगा और बिना किसी को नुकसान पहुंचाए पैसे लाये जाएंगे।

एक खास हिदायत यह दी गयी थी कि डाकों के दौरान कि भी औरतों के साथ किसी प्रकार का अभद्र व्यव्हार नहीं करेगा। आजाद हर औरत को अपनी माँ और बहन समझते थे। दल ने पहला डाका पास के ही एक गाँव में डाला। एक धनि के घर में घुसते ही सबने मूल्यवान वस्तुएं और पैसे बटोरने शुरू कर दिए। घर की कुछ महिलाओं ने उन युवाओं को धक्का दिया। उन्होंने ने ये भांप लिए कि क्रन्तिकारी किसी भी महिला पर जवाबी कार्यवाही नहीं कर रहे थे।

जब महिलाओं ने ये देखा तो वो उन सब को धक्का देने लगीं और कुछ ने तो बंदूकें भी छीन लीं। रामप्रसाद बिस्मिल ने देखा कि एक औरत ने आजाद के हाथ से बन्दूक छीन ली है और आजाद वहीँ पास में खड़े है। इस पर रामप्रसाद बिस्मिल ने उस औरत के हाथ से बन्दूक छीनी और आजाद को पकड़ कर बाहर लाये। उन्होंने आजाद को डांटा और समझाया कि उन्हें समझदारी से काम लेना चाहिए।

एक बार उन्होंने ने एक मालदार घर में डाका डाला जहाँ से उन्हें बहुत धन, आभूषण और पैसे मिले। सारा सामान समेटा आ रहा था कि अचानक आजाद कि नजर अपने एक सदस्य पर पड़ी जो जबरदस्ती एक औरत के हाथ से सोने के कंगन उतार रहा था। ये देख आजाद का खून खौल उठा। उन्होंने तुरंत उसे पिस्तौल से गोली मार कर वहीं ढेर कर दिया। खून ख़राब होने के कारण सब को बिना कुछ लिए ही जाना पडा।



इस घटना के बाद एक दिन एक मालदार घर में सफल लूट हुयी तो बिस्मिल ने देखा कि आजाद गायब हैं। जब उन्होंने वापस जाकर अन्दर देखा तो पाया एक बूढी औरत आजाद का हाथ थामे है। आजाद सिर्फ इसलिए अपना हाथ नहीं छुड़ा रहे थे कहीं उस औरत को चोट न आ जाए। बिस्मिल ने गुस्से में आजाद का हाथ छुड़वाया और उन्हें गुस्सा हुए।

एक दिन एक क्रन्तिकारी ने आकर यह खबर दी कि गाजीपुर के एक बड़े मठ के महंत कि हालत बहुत ख़राब है। उन्हें उनके बाद मठ की जिम्मेवारी उठाने के लिए एक योग्य शिष्य की तलाश है। सब ने सोचा अगर मठ पर उनका अधिकार हो जाए तो उनकी धन की समस्या ख़त्म हो जाएगी। इस काम के लिए चन्द्रशेखर को सबसे योग्य समझा गया और उन्हें महंत के पास भेजा गया। लेकिन आजाद के वहां जाने और महंत की देख-रेख करने से महंत के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा। फिर आजाद ने मठ छोड़ दिया।  आजाद वहां से सीधे कानपुर चले गए। कानपुर उस समय तक सभी क्रांतिकारियों का प्रमुख केंद्र बन गया था।

कानपुर से ही ‘प्रताप’ नामक प्रसिद्द दैनिक छपता था। चन्द्रशेखर आजाद की यहीं भगत सिंह से मुलाकात हुयी। भगत सिंह अपनी देश सेवा के लिए अपनी शादी छोड़कर आये थे। दोनों में एक ऐसा रिश्ता कायम हो गया जिसने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। अब समस्या यह थी कि अपने मिशन को आगे कैसे बढाया जाये।

सभी क्रांतिकारियों ने मिल कर योजना बनायीं कि सबसे पहले आम जनता को हमारी क्रांति के बारे में जागरूक करना पड़ेगा। इसके लिए आजाद ने अपने एक मित्र से छः महीने के लिए 4000 रुपये निजी कर्ज के तौर पर मांगे। उन पैसों से बनारस में पोस्टर लगाये गए। इसकी सूचना पुलिस अधिकारीयों को मिल चुकी थी और वे क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए उनके पीछे लग गयी। लेकिन सब चकमा देकर भाग निकले। चन्द्रशेखर आजाद अपने तीन साथियों के साथ अपनी माँ के पास पहुंचे। जो आजाद के पिता और उनके भाई की मृत्यु के बाद कानपुर में एक छोटे से माकन में रह रहीं थीं।

तकरीबन 3 महीने बाद रूपये उधार देने वाला दोस्त एक सुबह चंद्रशेखर से पैसे मांगने वापस आ गया। जब आजाद ने कहा की बात 6 महीने कि हुयी थी तो उस मित्र ने कहा कि उसने आजाद के लिए पैसे किसी और से लिए थे और वह अब वापस मांग रहा है।  इस नई समस्या से निपटने के लिए चंद्रशेखर ने 2-3 दिन की मोहलत मांगी। पैसे चुकाने के लिए एक लूट कि योजना बनायीं गयी। दिल्ली के चांदनी चौंक में उन्होंने एक जौहरी कि दूकान पर डाका डाला और 14000 रुपये से ज्यादा की नकदी लूट कर लाये। इन्हीं पैसों से उन्होंने अपना कर्जा चुकता किया।

भगत सिंह को इस तरह लूटपाट करना अच्छा नहीं लगता था।  वो बार-बार उन्हें समझाते थे कि इस तरह  हिन्दुस्तानियों पर नकारात्मक  प्रभाव पड़ता है। उनके सामने हमारी छवि ख़राब होती है। इस बात पर सभी ने सहमति जताई। परन्तु दल का कार्य आगे बढाने के लिए पैसों की जरुरत तो पड़ती ही। इसलिए ये योजना पारित की गयी कि आज के बाद बस सरकारी खजाना ही लूटा जाएगा। इस योजना के तहत 9 अगस्त 1925 को काकोरी रेलवे स्टेशन के पास एक ट्रेन से सरकारी खजाना लूटा गया।

खजाना सरकारी था तो सरकार का अपनी शाख को बचाना जरुरी हो गया था। इसी सन्दर्भ में क्रांतिकारियों की  धर पकड़ शुरू की गयी। रामप्रसाद बिमिल सहित कई क्रन्तिकारी पकडे गए लेकिन चंद्रशेखर हाथ न आये। इस घटना के बाद चंद्रशेखर अंग्रेजों की पकड से दूर एक गाँव ढींगरपुर पहुँच गए। वहां वह एक सन्यासी ब्रह्मचारी बन कर हनुमान मंदिर के निकट कुटिया बना कर रहने लगे।



वो किसी से बात नहीं करते और ध्यान लगा कर पुराणी बातों का विश्लेषण करते थे। बस फिर क्या था सब लोग उन्हें पहुंचा हुआ संत समझने लगे और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उन्हें घेर कर रखते। इस से उन्हें परेशानी होने लगी। एक दिन उस गाँव के जमींदार वहाँ आये तो चंद्रशेखर ने उनसे कहा कि उन्हें एकांत चाहिए और गाँव वाले उनको बहुत परेशान करते हैं। इस पर गांव का जमींदार उन्हें अपने साथ अपने घर ले गया। धीरे-धीरे आजाद को पता चला कि जमींदार भी अंग्रेज विरोधी है। तब चंद्रशेखर आजाद ने उसे ओनी असलियत बताई और कुछ दिनों बाद वहां से विदा लेकर झाँसी चले गए।

झाँसी जाकर चंद्रशेखर आजाद ने एक मोटर कंपनी में काम करते हुए गाडी चलानी सीखी। अंग्रेज सरकार बड़ी तेजी से क्रांतिकारियों को ढूंढ रही थी। उत्तर प्रदेश में रहना खतरे से खाली न था इसलिए आजाद बम्बई चले गए। उनके साथी क्रांतिकारी जो काकोरी कांड में उनके साथ थे, फंसी दे दी गयी थी। बम्बई में व्यस्तता भरी जिंदगी और क्रांतिकारियों की फांसी का दुःख उन्हें हर पल सताता था।

इसी बीच उनकी मुलाकात विनायक दामोदर सावरकर से हुयी जो कि ब्रिटिश विरोधी सेनानी थे। उन्होंने आजाद के अन्दर एक ऐसी शक्ति का संचार किया जिससे आजाद एक बार फिर से अन्ग्रेजों के विरुद्ध युद्ध के लिए तैयार हो गए। दामोदर ने उन्हें समझाया कि एक क्रन्तिकारी के जीवन में सुख दुःख आते रहते हैं। उनसे घबराना नहीं चाहिए। दुबारा क्रांतिकारियों को एकत्रित करो और अपने मकसद को आगे बढ़ाओ।

बिखर चुकी पार्टी को दुबारा बनाने के लिए भगत सिंह और राजगुरु जी जान से जुटे थे। इसी बीच चंद्रशेखर आजाद भी बम्बई से वापस कानपूर आ गए। भगत सिंह और राजगुरु ने उनका पता लगाया और दुबारा पार्टी संगठित की। यह कार्य 8 अगस्त 1928 को किया गया। कुछ दिनों बाद क्रांतिकारियों ने वायसराय लार्ड इरविन को मरने की योजना बनायीं। परन्तु योजना असफल रही।

1927 में अंग्रेजों ने भारतियों के लिए एक कमीशन बनाया। जिसका नाम साइमन कमीशन था। इसका भारत में हर जगह विरोध हो रहा था। जब यह कमीशन 28 अक्तूबर को लाहौर पहुंचा तो लाला लाजपत राय के नेतृत्व में इसका विरोध किया गया। विरोध प्रदर्शन तेज होते देख अंग्रेज अधिकारी स्कॉट ने लाठीचार्ज के आदेश दे दिए। इस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय जख्मी हो गए और जख्मों के कारन 17 नवम्बर 1928 को वो इस दुनिया को छोड़ कर चले गए।

इस घटना से भगत सिंह को बहुत अघात पहुंचा। पार्टी के कर्यकर्ताओं के साथ मिल कर उन्होंने स्कॉट को मारने की योजना बनायीं। जयगोपाल को स्कॉट की जानकारी निकलने के लिए कहा गया। निश्चित किये गए दिन भगत सिंह, जयगोपाल, राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद स्कॉट को मरने के लिए गए।

जयगोपाल ने जानकारी तो सब इकट्ठी कर ली थी लेकिन उन्होंने स्कॉट को कभी देखा नहीं था। उस दिन स्कॉट की जगह सांडर्स की ड्यूटी थी।  इसलिए अनजाने में उन्होंने स्कॉट कि जगह सांडर्स को मार दिया। भागते समय दो कांस्टेबल उनका पीछा करने लगे। चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें वापस चले जाने की चेतावनी दी। जब वह वापस नहीं गए तो आजाद ने गोली चला दी और एक कांस्टेबल वहीं ढेर हो गया।

सांडर्स की हत्या अंग्रेज सरकार को चुनौती थी कि अब भारतवासी चुप नहीं रहने वाले। इन क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए पूरे लाहौर में अंग्रेजों ने कड़ा पहरा बिछा दिया। चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह अपने साथियों समेत अंग्रेजों की आँखों में धुल झोंक कर वहां से निकल गए। आजाद मथुरा पहुँच गए। भगत सिंह कलकत्ता पहुँच गए।

कुछ दिनों बाद आजाद और भगत सिंह क्रांतिकारियों सहित आगरा पहुँच गए। वहां दो कमरे किराये पर लिए गए। एक कमरे में बम बनाने की फैक्ट्री लगायी गयी। दूसरे कमरे में बम बनाने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा। इसी बीच उन्हें पता चला की केंद्रीय असेंबली में 2 बिल पारित होने वाले हैं जिससे भारतवासियों के लिए जीना और भी मुश्किल हो जाएगा। इस बिल के विरोध में असेंबली में बम फेंकने कि योजना बनायीं गयी और इसके लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को इस कार्य के लिए चुना गया।

भगत सिंह ने अपनी योजना बताई कि बम फेंकने के बाद वे अपनी गिरफ्तारी दे देंगे। आजाद को यह बात सही नहीं लगी परन्तु भगत सिंह अपनी बात पर अड़े रहे। 8 अप्रैल 1929 को बिल पास होने वाला था। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम और पर्चे फेंक आकर अपनी गिरफ़्तारी दे दी। उधर पुलिस ने बम बनाने वाली फक्ट्रियों को ढूंढ लिया और सारे क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया। एक बार फिर चंद्रशेखर आजाद अकेले पड़ गए थे।

दिल्ली में मुकद्दमा चला और भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सजा हुयी। उन्हें लाहौर भेज दिया गया जहाँ उन पर सांडर्स और बम फैक्ट्री का केस चलाया गया और मृत्युदंड दिया गया। चन्द्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को जेल से भगाने के लिए मानाने कि कोशिश की लेकिन भगत सिंह न माने।

उन्होंने इलाहाबाद में जवाहरलाल नेहरु से उनके निवास आनंद भवन पर बात की। उन्होंने कोई भी सहायता करने से इंकार करते हुए कहा कि गाँधी जी अहिंसा के पक्ष में हैं और वे हिंसा करने वालों के लिए कुछ नहीं कर सकते। इस बात से उन्हें बहुत गुस्सा आया। काफी देर बहस हुयी और नेहरु ने गुस्से में उन्हें वहां से जाने को कह। आजाद अपनी साइकिल पर अल्फ्रेड पार्क में आ गये।

वहां पर वे अपने एक मित्र के साथ कुछ विचार विमर्श कर रहे थे। तभी अचानक सी.आई.डी. नॉट बाबर जीप से वहां आ पहुंचा। चंद्रशेखर ने आजाद ने खतरा भांपते हुए अपनी मित्र को वहां से भगा दिया। स्वयं वे अंग्रेजों से लड़ने के लिए अकेले तैयार हो गए। उन्होंने बड़ी बहादुरी के साथ उनकी गोलियों का सामना किया। उनके पास गोलिया कम पड़ रहीं थीं।

उन्होंने एक गोली बचा कर रखी और बाकी से जवाबी हमला करते रहे। जब सारी गोलियां ख़त्म हो गयीं तो आजाद ने उस एक गोली से खुद की आत्मा को शरीर से आजाद कर लिया। उन्होंने साबित कर दिया कि वे आजाद थे और आजाद ही रहेंगे। उनका खौफ अंग्रेजों में इतना था कि उनके प्राण त्याग देने के बाद भी किसी कि हिम्मत नहीं थी उनके पास जाने की।

उनकी मौत की पुष्टि करने के लिए उनपर और गोलियां चलायी गयीं। तब जाकर उनके शरीर को देखा गया। 27 फ़रवरी 1931 को  चंद्रशेखर आजाद ने देश कि आज़ादी की ऐसी नींव डाली जिससे 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया।

अंग्रेजों ने बिना किसी को बताये आजाद का अंतिम संस्कार कर दिया। जब भारतवासियों को आजाद के बलिदान कि खबर मिली तो  वे अल्फ्रेड पार्क में एकत्रित हो गये और उस पेड़ की पूजा करने लगे। चंद्रशेखर आजाद को समर्पित उनकी एक मूर्ती भी अल्फ्रेड पार्क में बनायीं गयी है। वे सच्चे रूप में एक ऐसे देशभक्त थे जिन्होंने अपने देश की आज़ादी के लिए अपना परिवार, अपनी जवानी और अपने कई सपने दांव पर लगा भारतवासियों को अपना परिवार समझा। अपना जीवन उन्हीं के नाम कर दिया।



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धन्यवाद।

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  1. Avatar शशांक शुक्ल

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